नारदवाणी: फिरोजपुर झिरका जाएंगे क्या बड़े भैय्या

देश रोजाना न्यूज के नारदवाणी में आज हरियाणा की सियासत के साथ ही नूंह जिले की वर्तमान स्थिति का उल्लेख किया गया। इसमें नूंह में व्याप्त परेशानियों का भी जिक्र किया गया। पत्रकारिता पर भी सवाल उठाए गए। बाकी चीजों को नीचे विस्तार से जानें........

Created By : Shiv Kumar on :11-01-2022 20:38:25 प्रतीकात्मक तस्वीर खबर सुनें

मेवात की सियासत में तीन सियासी घराने अहम हैं। इनके बिना यहां की सियासत अधूरी समझी जाती है। इन दिनों इनमें काटपुरी परिवार चर्चा में हैं। सुनने में आ रहा है कि पुन्हाना से हाथ वाले पहलवान मोहम्मद इलियास व उनके छोटे भाई नायब में कुछ सियासी समझौता हुआ है। भाई के लिए इलियास पुन्हाना विधानसभा के सियासी मैदान को छोड़कर फिरोजपुर झिरका में अपनी नई पारी के लिए सियासी पिच तैयार कर रहे हैं। इस बात में कितनी सच्चाई है या फिर इलियास की कलाकारी है यह तो रब जाने, लेकिन इन दिनों इस चर्चा के पर्चा बंट रहे हैं। हालांकि इस बात की पुष्टि दोनों भाईयों में किसी ने नहीं की है, लेकिन नायब का पुन्हाना में बंगला बनाकर रहना इस ओर इशारा जरूर कर रहा है। हालांकि सियासी जानकार इसे संभव नहीं बता रहे हैं। लेकिन ऐसा होता है तो फिरोजपुर झिरका में कईयों की लाइन जरूर खराब हो जाएगी। वहां पहले से सपने पाले बैठे नसीम अहमद को जोर का झटका धीरे से लगेगा तो और कईयों की लालटेन बुझ जाएगी। जो बाजीगरी इलियास कर सकते हैं वो किसी और के बसके बात नहीं। खैर सियासत में कई बात असंभव नहीं होती और नेताओं के लिए पार्टी व क्षेत्र बदलना कपड़ा बदले जैसा है। लेकिन इस चर्चा से नायब के समर्थकों में लंबे समय के बाद उमंग दिखाई दे रही है और वो इस हवा को रफ्तार देने की कोशिश कर रहे हैं तो इलियास समर्थक महज पोलाव से ज्यादा कुछ नहीं मान रहे हैं।
मोरा जिया न लगे जेजेपी में ::::::::::
मेवात के कई नेता ऐसे हैं जिनका जिया जेजेपी में नहीं लग रहा है। आज-कल की उम्मीद में लगभग दो साल काट चुके इन नेताओं के चहरे व मन में निजी काम तक न होने का भाव साफ झलकता है। दबी जुबान से मौका लगने पर अपना गुब्बार भी जब-तब निकालते रहते हैं। लेकिन बात वहां तक पहुंच नहीं पा रही है जहां तक वो पहुंचाना चाहते हैं। नेताओं को मलाल है कि जो उम्मीद उन्हें थी उस पर प्रदेश में दो नंबर की हैसियत रखने वाले सहाब खरे नहीं उतर रहे। लेकिन अभी वक्त है जाएं तो जाएं कहां हजूर। हालात ये हैं कि नेताओं के अपने निजी काम तो छोड़ दिजिए, छोटे-छोटे काम भी वो नहीं करा पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें डर यह भी है कि कुछ दिन बाद फिर उन्हें जनता में वोट की अपील करने के लिए जाना होगा तो वो किस मुंह से वोट मांगेंगे। जेजेपी पर भारी भरकम महकमे होने के बाद भी कार्यकर्ताओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। यह कड़वा सच है कि कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों में असंतोष का भाव है। अनदेखी का यही आलम रहा हा तो आने वाले समय में एक-दो नेता जल्द ही हरी-हरी पगड़ी बांध सकते हैं। अब इस पर चंडीगढ़ में बैठे शीर्ष नेताओं को ध्यान देने की जरूरत है। वैसे भी मेवात में जेजेपी की हालात ज्यादा बेहतर नहीं है।
याद आने लगे पहले प्रधान जी ::::::
मेवात भाजपा में भी इन दिनों जेजेपी जैसा ही हाल है। कार्यकर्ताओं को भी अपने छोटे-मोटे काम न होने की शिकायत लगी रहती है। मेवात से पार्टी का कोई विधायक न होने के कारण कार्यकर्ताओं के काम कराने का सबसे अधिक वजन पार्टी के प्रधान पर होता है। पार्टी के प्रधान अपनी ओर से भले ही बेहतर करने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन अब कार्यकर्ता पुराने प्रधान की कार्यशैली को याद जरूर कर रहे हैं। कुछेक कार्यकर्ता तो साफ कहते हैं कि काम कराने का जो रौब और रुतबा पहले प्रधान का था वो अब कम हो गया है। कुछ लोग दोनों प्रधानों की जाति का हवाला देकर जाट और बनिया में इतना फर्क होने की बात कहकर चुटकी लेने से पीछे नहीं हटते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि पुराने प्रधान की जो पकड़ अफसरशाही व नेताओं पर थी वो अब कुछ कम और कमजोर नजर जरूर आती है। हालांकि कुछ कार्यकर्ताओं को पुराने प्रधान की खरी-खरी रास नहीं आती थी। खैर सियासत है हर जगह गुटबाजी होना स्वभाविक है तो हर किसी का अपना-अपना लहजा व काम कराने की शैली होती है। लेकिन भाजपा को भी कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने व उनके काम कराने के लिए अधिक मेहनत की जरूरत है।
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मनरेगा मेवात में बनी मेवा :::::::::::::
मनरेगा इन दिनों मेवात के अधिकारियों व उनके चहेतों के लिए मेवा बनी हुई है तो मीडिया के लोग भी इस बहती गंगा में हाथ धोने में पीछे नहीं हैं। यहां पहले भी मनरेगा में करोड़ों रुपये का घोटाला हो चुका है तो अब फिर कई कार्यों में घोटाले की बू आ रही है। जिसमें अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक शामिल ही नहीं बल्कि अपने दम पर इसे करा रहे हैं। इस स्थिति में यहां ईमानदार अफसरों में शुमार जिले के कैप्टन सहाब की कप्तानी पर भी कालिग पुत रही है। अगर वो इस पर ध्यान नहीं देंगे तो निश्चित तौर सवाल उनकी रहबरी पर भी उठेंगे। कड़ी मेहनत कर मास्टर की कुर्सी से मनरेगा के साहब तक पहुंचे गजेंद्र जी को इस दलदल बचने की विशेष जरूरत है। मनरेगा के तहत कुछ अधिकारी अपनी जेब तो भर ही रहे हैं। कुछ पत्रकार भी पहले खबर छापकर फिर न छापने की सेटिंग कर बिचौलियों के माध्यम से अपनी जेब भर रहे हैं। पहले एक पत्रकार मनरेगा में वसूली के चक्कर में जेल की हवा खा चुका है तो अब एक और दैनिक समाचार पत्र का खबरची पहले वाले की राह पर दौड़ लगाकर खुलेआम मनरेगा के नाम पर वसूली कर रहा है। देखना होगा इस मामले पर कैप्टन साहब कब और कितना संज्ञान लेते हैं या फिर पहले की तरह इसे भी ठंड़े बस्ते में डालकर अपनी कार्यशैली पर सवालिया निशान लगवाते हैं।

शेरसिंह डागर

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