जहाँगीर कला दीर्घा में अनटोंड कैनवास का प्रदर्शन

फिलहाल मुंबई में हैं जिनके घर पर कला का कोई माहौल नहीं था, पर कला थी जिसे लोग सराहते थे। बहन के कहने पर कला में कोर्स और अभिनव कॉलेज से होते हुए आप अलंकारिक कृतियों से शुरू कर आज समाज के विशेष मुद्दों पर विशिष्ट शैली में अपनी कृतियों से लगातार अपनी बात समाज तक पहुंचा रही हैं।

Created By : ashok on :15-01-2023 15:40:46 पंकज तिवारी खबर सुनें


पंकज तिवारी
कुछ अजीब सा टेक्स्चर, बेचैन व्यथित आकृतियां, बहुत कुछ पा लेने को उत्सुक व सहेजकर रख लेने को आतुर बेतरतीब अंगुलियाँ, बिल्कुल ही हल्के किन्तु प्रभावित कर लेने वाले रंगों का संयोजन, ऊपर गोले में संघर्षरत लोग एक बारगी गर्म सूर्य का भ्रम पैदा होता है, पर गहराई से परखने पर गोल आकृति एक रोटी में बदल जाती है। रोटी प्राप्ति हेतु संघर्ष खुद-ब-खुद नजर आने लगता है और लॉकडाउन का दौर एक बार फिर आंखों के सामने नाच उठता है। दर्द, कराह, चीखें, सब ताजी हवा के मानिंद घूम जाते हैं सामने से। चित्रकार स्वाती विश्वनाथ साबले जो पुणे से हैं,

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फिलहाल मुंबई में हैं जिनके घर पर कला का कोई माहौल नहीं था, पर कला थी जिसे लोग सराहते थे। बहन के कहने पर कला में कोर्स और अभिनव कॉलेज से होते हुए आप अलंकारिक कृतियों से शुरू कर आज समाज के विशेष मुद्दों पर विशिष्ट शैली में अपनी कृतियों से लगातार अपनी बात समाज तक पहुंचा रही हैं।

आप लिखती भी हैं विशेषत: मराठी में।
कला में शुरुआत वो भी शून्य से करने के बाद बहुत ही कम समय में अपनी एक अलग शैली ईजाद कर लेना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है जो कलाकार स्वाती हेतु आम हो गई है। पति विश्वनाथ साबले जो ख्यातनाम दृश्य चित्रकार हैं और जे.जे. कॉलेज मुंबई में डीन भी, के साथ ने आपको चित्रकारी हेतु प्रेरित किया। पहला कैनवास आपको उन्हीं से मिला। शुरू में सादे काम ही आप करती रहीं, पर धीरे-धीरे टैक्स्चर पर अच्छी पकड़ होती गई और आज गंभीर विषयों के साथ ही रंगों का अद्भुत संयोजन भी आपकी पहचान है।

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आपकी कला में इतना कुछ कर पाने के पीछे बेटी का सहयोग भी है। जहांगीर आर्ट गैलरी में पहली बार किसी की प्रदर्शनी देखने पर आपके मन के भीतर का आकाश चमक उठा। आप भी अपनी प्रदर्शनी के सपने देखने लगीं और जल्द ही एकल प्रदर्शनी का सफल आयोजन कर सकीं। हालांकि मन में डर था, पर लोगों की प्रतिक्रियाओं ने आपको उत्साह से भर दिया। 2018 में आपकी कृति का चुनाव साउथ कोरिया में हुआ। वहां पर भी आपके चित्र खूब सराहे गये। 2018 में ही इंडियन हैबिटेट सेंटर नई दिल्ली में हुई प्रदर्शनी ने लोगों का ध्यान आपकी कृतियों की तरफ खींचा। ललित कला अकादमी के राष्ट्रीय प्रदर्शनी में भी आपके चित्र प्रदर्शित हो चुके हैं। आप निरंतर अपने काम में लगी हुई हैं। आजकल अमूर्तन पर भी आपकी सक्रियता है। आप चारकोल, ऐक्रेलिक, मिक्स मीडिया आदि माध्यमों में रचना करती हैं।
कोरोना काल और मनुष्य का खुद से संवाद, ये बात लगभग सभी के साथ लागू हुई, वो चाहे कलाकार हो, कवि- साहित्यकार हो या फिर आम सोच रखने वाला जनमानस, जो इस भागमभाग समय में कभी खुद से बात नहीं कर सका। खुद को समझ नहीं सका, परिवार में खुद के होने का एहसास नहीं करा सका, पांच इंच के स्क्रीन में दिन रात खपा रहा।

ऐसे लोगों हेतु आत्मसाक्षात्कार का मौका रहा इस पूरे समय में। हालांकि मैं आपदा के समर्थन में नहीं हूं, बल्कि मेरी दुआ है कि ऐसी आपदा फिर कभी नहीं आये, पर लोगों से ये उम्मीद जरूर कर सकता हूँ कि व्यस्तता कितनी भी हो, अपने और अपनों के लिए समय हमेशा बचाकर रखें। जीवन के मकड़जाल से कुछ पल अपने लिए भी चुरायें। कलाकार स्वाती साबले कहती हैं कि कोरोना काल में घर में लगी खिड़की ही मेरी दुनिया हो गई थी। उसी फ्रेम से मैं दुनिया देख पा रही थी। वहीं से पहली बार नजदीक से संवाद हो सका कौवों से। मैं पहली दफा इनके बारे में गंभीरता से अध्ययन करने लगी। मेरी कृतियों में इनकी उपस्थिति हो सकी। प्रकृति और प्रकृति में जो जीव हैं, उनको हम अगर अपनी तरह संभालकर रखते तो आज यह स्थितियां नहीं आती, इसलिए हमें प्रकृति से सामंजस्य बनाकर रखना ही होगा।

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कोरोना काल के बाद इनकी कृतियों में कौवा और द्वंद्व में डूबे मनुष्य का संयोजन, भयानक दौर, भयभीत, भयावह माहौल, सहमी-सहमी आंखें आसानी से देखी जा सकती हैं। देखी जा सकती है कोरोना के बाद उपजी और कई समस्याएं। कैनवास कैनवास न होकर भावों का सागर हो उठा है, जहां केवल और केवल समाज में व्याप्त समस्याओं और उसके कारण एवं निदान पर कार्य है। एक कृति में दर्द और दर्द में डूबा मनुष्य है, जहां कौवा उसके सहचर के रूप में उसे ढांढस बंधाता हुआ सा है। बड़ी ही पैनी धार है कलाकार स्वाती साबले के कृतियों में। स्वाती साबले के कृतियों की प्रदर्शनी 17 जनवरी से जहाँगीर कला दीर्घा में आयोजित है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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