जिसके हृदय में गीता, उसने जग जीता

3 दिसंबर को गीता जयंती है। श्रीमद्भागवत गीता के बारे में किसी को यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि यह कैसी महान कृति है। इसमें भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से निकले प्रेरक विचार हैं। गीताजी का भाष्य अनेक विद्वानों ने किया है। कुछ भाष्य मैंने भी पढ़े हैं।

Created By : ashok on :03-12-2022 15:10:16 गिरीश पंकज खबर सुनें

गिरीश पंकज
3 दिसंबर को गीता जयंती है। श्रीमद्भागवत गीता के बारे में किसी को यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि यह कैसी महान कृति है। इसमें भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से निकले प्रेरक विचार हैं। गीताजी का भाष्य अनेक विद्वानों ने किया है। कुछ भाष्य मैंने भी पढ़े हैं। जैसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जब मंडाले जेल में थे, तो उन्होंने 'गीता रहस्य' नामक ग्रंथ लिखा, जो अनेक भाषाओं में अनूदित हुआ। हिंदी में उसका अनुवाद माधव राव सप्रे और अन्य लोगों ने किया। तिलक जी का यही निष्कर्ष था कि गीता निवृत्तिपरक नहीं है। यह कर्मयोगपरक है। यानी गीता हमें पलायन नहीं सिखाती, वह जूझने का संस्कार देती है। महात्मा गांधी जी ने भी तिलक जी के इस काम की सराहना की।

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इसी तरह स्वामी रामसुखदास जी ने 'साधक संजीवनी' नामक ग्रंथ लिखा, जो श्रीमद्भगवद्गीता का बहुत ही अद्भुत भाष्य है। एक भाष्य विद्रोही संन्यासी के रूप में चर्चित रहे स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भी किया है, जो 'गीता हृदय' नाम से लोकव्यापी हुआ। यह और बात है कि काल प्रवाह के चलते नई पीढ़ी के अनेक लोग स्वामी जी के इस अवदान से परिचित नहीं होंगे, लेकिन यह कृति आज भी अमर है और उसका हर अध्याय न केवल पठनीय है, वरन दिशा बोधक भी है। स्वामी जी का जन्म 22 फरवरी 18 जनवरी 1889 को गाजीपुर में हुआ। उनका महाप्रयाण 26 जून 1950 को मात्र 61 वर्ष की आयु में हुआ। वे क्रांतिकारी थे, दार्शनिक थे और किसानों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्षरत रहे। स्वामी जी ने गीता हृदय के बारे में अपनी भूमिका में कहते हैं कि मेरे जैसे गीता प्रेमी के लिए मार्क्सवाद में स्थान नहीं है, और यह कि गीता धर्म का मार्क्सवाद के साथ मेल नहीं है। गीताधर्म का मार्क्सवाद के साथ विरोध नहीं है। किंतु मेरे जानते गीताधर्म मार्क्सवाद का पोषक है। मेरे ख्याल से गीता के 'सर्वभूतात्माभूतात्मा' और 'सर्वभूतहितेरता:' सिवाय सच्चे मार्क्सवादियों के और कौन हो सकते हैं। वही तो समस्त मानव समाज की पुनर्निर्माण इस तरह करना चाहते हैं कि एक आदमी दुखी, पराधीन समुन्नति के साथ साधनों से वंचित रह जाए।


स्वामी सहजानंद अपने ग्रंथ में कर्तव्य अकर्तव्य के प्रश्न पर बातचीत करते हैं। अध्यात्म और भौतिकवाद का विश्लेषण करते हैं। गीता के समन्वयवादी स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। कर्म के भेद, यथार्थ, कर्तव्य और कर्म इन सब का जीवन में प्रभाव, महात्मा और दुरात्मा कौन है, संन्यास क्या है और लोक संग्रह क्या है, इन सब का विश्लेषण भी करते हैं। संन्यास और त्याग, आत्मा का स्वरूप, व्यावसायिक बुद्धि, धर्म, सरकार और पार्टी, स्वधर्म, स्वकर्म, आस्तिक और नास्तिक का भेद, देव और असुर संपत्ति, समाज का कल्याण, कर्म और धर्म, इन सब की बहुत सुंदर व्याख्या करते हैं। गीता में साम्यवाद कहां है, उसको बताते हैं। कर्मवाद और अवतारवाद क्या है, सृष्टि का कर्म क्या है, सृष्टि और प्रेम, अद्वैतवाद और ज्ञान तथा अन्य भक्ति योग के साथ ही योग शास्त्र आदि की बेहद सजीव और प्रामाणिक मीमांसा करते हैं।

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स्वामी जी ने गीता के सभी अठारहों अध्याय को बहुत विस्तार के साथ समझाने की कोशिश की है। यहां उन सब का विश्लेषण संभव नहीं है। मैं तो दो चार बिंदुओं पर ही बात कर सकता हूँ। भगवान श्रीकृष्ण अट्ठारहवें अध्याय में संन्यास की भी चर्चा करते हैं। विमर्श करते हुए स्वामी जी कहते हैं कि संन्यास और त्याग दो चीजें हैं। किसी के लिए जो कर्म निश्चित कर दिए गए हैं, उनका संन्यास उचित नहीं है। और अगर भूल या धोखे में पड़ कर उनका त्याग कर दिया जाए तो वह तामसी त्याग माना जाता है।


सृष्टि को कोई सत्ता संचालित करती है या नहीं, इस प्रश्न को भी स्वामी जी ने बहुत सुंदर ढंग से उठाया है। स्वामी जी ईश्वर की सत्ता पर विश्वास करते थे, लेकिन वे ढोंग और रूढ़ि के सख्त विरोधी थे। स्वामी जी सामूहिकता के, सहकारिता के पक्षधर थे, इसलिए वे कहते थे कि अकेला ज्ञान, अकेली क्रिया या अकेला साहस बेकार होता है। परस्पर सहकारिता के साथ काम करना चाहिए और यही सृष्टि का नियम भी है। स्वामी जी ने श्री कृष्ण भगवान के कर्म के सिद्धांत को बहुत विस्तार के साथ विश्लेषक किया है। वह कहते हैं कि क्रिया ही तो सृष्टि है। इसीलिए कर्म होता ही रहेगा। जब तक संसार बना है, सृष्टि बनी है, इससे छुटकारा किसी को नहीं मिल सकता। हाथ, पांव आदि इंद्रियों की तो यही बात है कि उससे कोई नहीं कोई क्रिया होती ही है। नहीं तो वह रहे ही नहीं। इसलिए आत्मदर्शी पुरुष कर्मों की नाहक उधेड़बुन में नहीं पड़ता, वह तो केवल कर्म करता रहता है। स्वामीजी ने मनुष्य के पूजा-पाठ जप तप आदि के बारे में गीता का हवाला देते हुए कहा है कि लोग समझते है कि कंठी माला जपना, चंदन अक्षत लगाना तथा घंटा घड़ियाल वगैरह बजा के धूप दीप आरती करना ही भगवान की पूजा है। ऐसा है नहीं।

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भक्ति तो सच्ची श्रद्धा और प्रेम के साथ की जाती है। उसे ही भगवान स्वीकार करते हैं। इसमें जरा भी कमी हुई तो पूरा मामला चौपट हो जाता है। तब वह केवल कोरा रोजगार बनकर रह जाएगा। स्वामी जी ने नरसी मेहता और नामदेव जैसे भक्तों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इनकी भक्ति श्रद्धा और प्रेम की भक्ति थी। शबरी और विदुर भी इसी तरह की भक्ति करते थे। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि स्वामी सहजानंद सरस्वती ने गीता को श्रद्धा की कसौटी पर नहीं, यथार्थ की कसौटी पर देखा। उसकी गहन मीमांसा की। स्वामी सहजानन्द जी की अमर कृति 'गीता ह्रदय' लोकप्रिय वेबसाइट 'गद्य कोश' में भी उपलब्ध है। हर जिज्ञासु पाठक को वहां जाकर आद्योपान्त पढ़ना चाहिए। मैं अपनी भावनाएं अर्पित करते हुए कहूँ तो जिसके हृदय में गीता, वही जगत को जीता।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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