सुप्रीमकोर्ट को क्यों याद आ रहे हैं शेषन!

आजकल पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त स्व. टीएन शेषन चर्चा में हैं। उनकी चर्चा सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ ने की है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सुनवाई करते हुए संविधान पीठ के अध्यक्ष केएम जोसेफ ने कहा कि हमें टीएन शेषन जैसा चुनाव आयुक्त चाहिए।

Created By : ashok on :25-11-2022 14:53:01 संजय मग्गू खबर सुनें

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संजय मग्गू
आजकल पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त स्व. टीएन शेषन चर्चा में हैं। उनकी चर्चा सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ ने की है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सुनवाई करते हुए संविधान पीठ के अध्यक्ष केएम जोसेफ ने कहा कि हमें टीएन शेषन जैसा चुनाव आयुक्त चाहिए। सरकार की हां में हां मिलाने वाला मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त नहीं चाहिए। दरअसल, कल यानी बुधवार को सुप्रीमकोर्ट की संविधान पीठ ने हाल ही में चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए अरुण गोयल की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए उनकी नियुक्ति की फाइल अपने पास बुला ली है।

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इस मामले में हुआ यह है कि पिछले शुक्रवार को पूर्व आईएएस अरुण गोयल ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्त ली थी और उसके अगले दिन यानी शनिवार को सरकार ने उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया। सोमवार को अरुण गोयल ने पदभार भी ग्रहण कर लिया। सुप्रीमकोर्ट को आपत्ति इस बात पर है कि उसने उधर मामले की सुनवाई की और इधर चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया। चुनाव आयोग के कामकाज की पारदर्शिता के लिए वर्ष 2018 में सुप्रीमकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में माँग की गई थी कि चुनाव आयुक्त (ईसी) और मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इन सब याचिकाओं को क्लब करते हुए इसे पाँच जजों की संविधान पीठ को रेफर कर दिया था। इसी याचिका पर इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग के कामकाज की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ वर्षों से चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्तो का कार्यकाल भी घटाया जाता रहा है।

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इधर कुछ सालों से कोई भी चुनाव आयुक्त अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। जब भी चुनाव आयोग में सुधार की बात चलती है, तो टीएन शेषन ही याद आते हैं। इसका कारण यह है कि चुनाव आयोग को उसकी शक्तियों का एहसास आजाद भारत में पहली बार टीएन शेषन ने ही कराया था। मुख्य चुनाव बनने के बाद टीएन शेषन ने सरकार की इच्छा के अनुसार चुनाव कराने की परंपरा पर रोक लगा दी। उस समय शायद पहली बार हुआ था कि किसी मुख्य चुनाव आयुक्त ने सरकार से पूछे बिना चुनाव स्थगित करा दिया था क्योंकि उन्हीं दिनों राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। 2 अगस्त 1993 को तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने 17 पेजों का आदेश जारी करते हुए कहा था कि देश में कोई भी चुनाव तब तक नहीं होंगे, जब तक सरकार चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों को मान्यता नहीं देती है।

तत्कालीन सरकार ने तमाम दांव-पेच अपनाए, लेकिन शेषन नहीं झुके। शेषन ने बंगाल में राज्यसभा का चुनाव नहीं होने दिया जिसकी वजह से तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और वही हुआ जो टीएन शेषन चाहते थे। सुप्रीमकोर्ट ने जिन मुद्दों को पिछले दो दिन की सुनवाई के दौरान उठाया है, वे वाकई संवेदनशील हैं। चुनाव आयोग के कंधे पर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा और शुचिता का दायित्व होता है। इसे हलके में नहीं लिया जा सकता है।

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