एशिया के लिए खतरा बनते शी जिनपिंग

इसके साथ एक संयोग भी जिनपिंग के साथ जुड़ गया। जब 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना हुई, तो यह तय किया गया कि पीएलए यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की कमान सरकार के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में रहेगी।

Created By : ashok on :25-10-2022 15:14:40 संजय मग्गू खबर सुनें

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संजय मग्गू
कल पूरी दुनिया में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन का एक वीडियो बहुत तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में दिखाया गया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बगल में बैठे पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ को हाथ पकड़कर सम्मेलन से बाहर कर दिया गया। इतना ही नहीं, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में दूसरे नंबर के नेता ली केकियांग को प्रधानमंत्री पद से भी हटा दिया गया। और आज खबर यह है कि सीसीपी यानी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने शी जिनपिंग को तीसरी बार पार्टी का महासचिव चुन लिया है। इसके साथ ही चीन विरोधी मीडिया में यह बात कही जाने लगी है कि शी जिनपिंग आजीवन राष्ट्रपति बने रहने की जुगाड़ में हैं।

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वे इसके लिए पार्टी संविधान में भी संशोधन कर सकते हैं। जिस तरह वायरल वीडियो में पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ को सम्मेलन से बाहर किया गया, उससे शी जिनपिंग की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पर जिनपिंग का पूरा कब्जा है। एक तरह से चीन में वे तानाशाह की हैसियत हासिल कर चुके हैं। अब सवाल यह है कि जिनपिंग के पास वे कौन से अधिकार हैं जिसके चलते वे इतने ताकतवर चुके हैं। उनकी बात को काटने का साहस क्यों किसी में नहीं है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ पुराने नेताओं का उनके शुरुआती दौर के बारे में यह कहना था कि वे ऐसे नेता थे जो किसी के साथ भी समझौता कर लेते थे। कहने का मतलब उनमें दृढ़ता का अभाव था। व्यक्तिगत तौर पर भी बचपन से ही वे राजकुमारों वाले हालात में पले-बढ़े थे। उनके पिता चीनी क्रांति के दौरान सामंतवादियों से लड़े थे, इसलिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में उनका काफी प्रभाव था। कभी चीनी कम्युनिस्ट शासन की नींव रखने वाले माओत्से तुंग ने कहा था कि सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है। यह सूत्रवाक्य जिनपिंग के दिलोदिमाग में बैठ गया था।

इसके साथ एक संयोग भी जिनपिंग के साथ जुड़ गया। जब 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना हुई, तो यह तय किया गया कि पीएलए यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की कमान सरकार के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में रहेगी। संयोग यह हुआ कि अपने पिता के राजनीतिक प्रभाव के चलते जिनपिंग सेंट्रल मिलेट्री कमीशन के चेयरमैन बना दिए गए। उन्होंने सेंट्रल मिलेट्री कमीशन का चेयरमैन बनते ही अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। सेना के चार हेडक्वार्टर -स्टाफ, पॉलिटिक्सि, लाजिस्टिक और आर्मामेंट (युद्ध सामग्री) को खत्म करके उसकी जगह 15 छोटी-छोटी एजेंसियां बना दी और उसकी कमान अपने हाथ में रखी। वह धीरे-धीरे अपने विरोधियों को भी पीएलए के माध्यम से ठिकाने लगाते रहे। जिस तरह कल उन्होंने हू जिंताओ और ली केकियांग को राजनीतिक रूप से ठिकाने लगाया है। दरअसल, शी जिनपिंग की ताकत का बढ़ना, भारत के लिए निकट भविष्य में चुनौती साबित हो सकता है। जिनपिंग की नीयत ठीक नहीं लगती है। वे भारत के प्रति पहले से ही दुराग्रही हैं। अब तीसरी बार राष्ट्रपति बनने पर भारत के प्रति क्या रवैया अख्तियार करेंगे, इसे समझना बहुत आसान है। ऐसे में जिनपिंग की नीतियों पर भारत को बहुत पैनी नजर रखने की जरूरत है।

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