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सम्पादकीय

कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं: संजय मग्गू

कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं: संजय मग्गू
कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैंसंजय मग्गूबताइए, क्या जमाना आ गया है। रोने, अपनी पीड़ा किसी अनजान व्यक्ति के सामने सुनाने के लिए भी क्राइंग क्लब खुलने लगे हैं। इसके लिए बाकायदा घंटे के...
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नारी शक्ति वंदन अधिनियमः सशक्त भारत की ओर एक ऐतिहासिक कदम

भारत में महिलाओं की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उन्हें बराबरी का स्थान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं।
सम्पादकीय 
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नए साल 2026 में करें नशे पर प्रहार, युवा पीढ़ी को इससे बचाना समय की मांग

समाज के बदलते परिवेश में कुछ अलग करने की चाह, मानसिक तनाव, कम समय में अधिक कमाने, बेरोजगारी और बहुत से गैर जरूरी शौक ऐसे कारण है जो
यूथ  सम्पादकीय 
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ऊसर में खिला फूल: दलित जीवन का संघर्ष

  प्रतिकूल परिस्थितियों में, जीवन की सारी उर्वर शक्तियों को निचोड़कर स्वयं को पल्लवित रखने का संघर्ष, ऊसर में फूल खिलने जैसा है। 'ऊसर' का अर्थ ही ऐसी ज़मीन है जो जीवन के लिए योग्य नहीं है, फिर भी कुछ कैक्टस जैसे उद्भिज उस ज़मीन से अपने जीवन का रस निचोड़कर खुद को जीवित रखते हैं और जीवटता का परिचय देते हैं। जालिम प्रसाद की आत्मकथा 'ऊसर में  फूल' भी ऐसे ही जीवन की कहानी है, जैसा मरुभूमि में कैक्टस का होता है।
सम्पादकीय 
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