हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी या बेटा? किसे मिलेगा परिवार पेंशन—जानें कानून क्या कहता है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—परिवार पेंशन न तो निजी संपत्ति है और न ही नॉमिनेशन से तय होती है; नियमों के मुताबिक पहले हक़दार हमेशा पत्नी होती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार पेंशन विवाद पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कहा कि पेंशन निजी संपत्ति नहीं है और इसका अधिकार नॉमिनेशन नहीं, बल्कि नियम तय करते हैं। अदालत ने मृत शिक्षक की पत्नी को पहला अधिकार देते हुए बेटे का नॉमिनेशन खारिज कर दिया, क्योंकि वह 34 साल का होने के कारण आश्रित की श्रेणी में नहीं आता था। यह फैसला हजारों सरकारी कर्मचारियों के परिवारों के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय करता है।
परिवार पेंशन को लेकर अक्सर सरकारी कर्मचारियों के परिवारों में विवाद पैदा हो जाते हैं—किसे प्राथमिकता मिलेगी? पत्नी को, बेटे को या किसी और नॉमिनेट व्यक्ति को? ऐसा ही एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पेंशन अधिकारों की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी। 
क्या था पूरा मामला?
विभाग ने यह भी तर्क दिया कि पेंशन फॉर्म पर पत्नी की फोटो न होने से वह पात्र नहीं हैं।
पत्नी ने इस निर्णय को गलत बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके पास ग्राम प्रधान द्वारा जारी विवाह प्रमाण पत्र और फैमिली कोर्ट का आदेश था, जिसमें 2015 में पति को उन्हें ₹8,000 भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट का स्पष्ट संदेश—“पेंशन निजी संपत्ति नहीं”
हाईकोर्ट ने U.P. Retirement Benefit Rules, 1961 और Civil Service Regulations का अध्ययन करते हुए कहा—
परिवार पेंशन न निजी संपत्ति है, न वसीयत की तरह बांटी जा सकती है।
जिसे पेंशन मिलेगी, वह सिर्फ नियमों के आधार पर तय होगा, नॉमिनेशन के आधार पर नहीं।
पत्नी है पहली हक़दार—नियम 7(4) साफ करता है प्राथमिकता
कोर्ट के अनुसार यदि मृत कर्मचारी पुरुष है, तो—
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पहली और मुख्य हक़दार उसकी कानूनी पत्नी होती है
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पत्नी को पेंशन देने का यह नियम 7(4) में स्पष्ट रूप से दर्ज है
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नॉमिनेशन इस प्राथमिकता को बदल नहीं सकता
बेटा क्यों नहीं था पात्र?
मृत शिक्षक के बेटे की मृत्यु के समय आयु लगभग 34 वर्ष थी।
नियमों के अनुसार बेटा तभी परिवार पेंशन का अधिकारी होता है जब:
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वह नाबालिग हो, या
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आर्थिक रूप से पूरी तरह आश्रित हो
बेटा न तो नाबालिग था, न आश्रित—इसलिए उसका नॉमिनेशन स्वतः खारिज माना गया।
नॉमिनेशन क्यों प्रभावी नहीं?
नियम 6 के अनुसार कर्मचारी परिवार के सदस्यों का नॉमिनेशन कर सकता है, लेकिन—
नॉमिनेशन प्राथमिकता क्रम को बदल नहीं सकता।
यह क्रम है:
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पत्नी/पति
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बच्चे
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माता-पिता
इसलिए कर्मचारी चाहे किसी का भी नाम लिख दे,
पत्नी का कानूनी हक़ सबसे पहले आता है।
पत्नी की आर्थिक स्थिति भी रही महत्वपूर्ण
कोर्ट ने माना कि:
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पत्नी की उम्र 62 वर्ष है
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आय का कोई साधन नहीं
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पति उन्हें वर्षों से भरण-पोषण राशि दे रहे थे
इससे साबित हुआ कि वह आर्थिक रूप से पूरी तरह आश्रित थीं, इसलिए प्राथमिक हक़दार भी।
फैसला हजारों परिवारों के लिए मार्गदर्शक
इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि—
पेंशन का अधिकार केवल कानून से तय होता है, न कि नॉमिनेशन या विभागीय व्याख्या से।
यह फैसला भविष्य के सभी परिवार पेंशन विवादों के लिए मिसाल बनेगा।



