झारखंड और केरल क्रिकेट संघों की टेंडर प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल

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पिछले कुछ महीनों में राज्य क्रिकेट संघों की टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताएं चर्चा में हैं। सिक्योरिटी, कैटरिंग, टेंटिंग और स्टेडियम ब्रांडिंग राइट्स जैसे टेंडरों की अंतिम तिथि बार-बार बढ़ाई जा रही है, अक्सर बिना किसी ठोस कारण के। यह कदम पारदर्शिता पर सवाल उठाता है और संदेह पैदा करता है कि कुछ चुनिंदा वेंडर्स को लाभ पहुंचाने की कोशिश हो रही है, जिससे खुली प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है।कई टेंडरों में पात्रता और चयन मानदंड इतने सख्त हैं कि केवल कुछ स्थापित सर्विस प्रोवाइडर्स ही योग्य हो पाते हैं, जिससे नए या स्वतंत्र वेंडर्स को मौका नहीं मिलता। इसके अलावा, कई टेंडर ई-प्रोक्योरमेंट प्लेटफॉर्म्स पर प्रकाशित नहीं होते, जिससे प्रक्रिया की पारदर्शिता और कम हो जाती है। मैनुअल सबमिशन की आवश्यकता भी भागीदारी को सीमित करती है, क्योंकि इसमें न अलर्ट्स मिलते हैं, न ही आसान पहुंच संभव होती है।हालांकि यह गड़बड़ी का पक्का सबूत नहीं है, लेकिन पब्लिक इंटरेस्ट वाले इन स्पोर्ट्स संस्थानों में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है। मीडिया, ऑडिटर्स और सिविल सोसाइटी की निगरानी से हाई-वैल्यू टेंडरों को निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है। ये कमियां या ये कहें की लापरवाही झारखंड क्रिकेट एसोसिसिएशन और केरल क्रिकेट संघ में देखी जा रही है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्‍स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।

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