Gurugram News: 22 कंपनियां, 260 करोड़ और 14 साल का इंतजार, ED का शिकंजा, एमडी और प्रमोटर गिरफ्तार
260 करोड़ लिए, सालों बाद भी प्लॉट नहीं: वाटिका ग्रुप के CMD अनिल भल्ला और प्रमोटर गौतम गिरफ्तार, 3 अक्टूबर तक ED रिमांड
गुरुग्राम के रियल एस्टेट सेक्टर में प्लॉट खरीदारों और निवेशकों से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने वाटिका लिमिटेड के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल भल्ला और प्रमोटर गौतम भल्ला को गिरफ्तार किया है। दोनों को गुरुग्राम की विशेष PMLA अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 3 अक्टूबर 2026 तक ईडी की हिरासत में भेज दिया गया।
गुरुग्राम: गुरुग्राम के रियल एस्टेट सेक्टर में प्लॉट खरीदारों और निवेशकों से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने वाटिका लिमिटेड के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल भल्ला और प्रमोटर गौतम भल्ला को गिरफ्तार किया है। दोनों को गुरुग्राम की विशेष PMLA अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 3 अक्टूबर 2026 तक ईडी की हिरासत में भेज दिया गया।

ईडी की जांच में सामने आई तस्वीर केवल दो गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं है। एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2010 से 2012 के बीच सात खरीदार संस्थाओं ने गुरुग्राम के वाटिका इंडिया नेक्स्ट और वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 प्रोजेक्ट में आवासीय प्लॉटों के लिए करीब 260 करोड़ रुपये अग्रिम दिए थे। वर्षों बीतने के बाद भी बड़ी संख्या में प्लॉट खरीदारों को नहीं मिल सके।
14 साल बाद भी जमीन का इंतजार
जांच के मुताबिक, वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 में करीब 90 करोड़ रुपये में खरीदे गए लगभग 1.10 लाख वर्ग गज क्षेत्र में अब तक एक भी प्लॉट डिलीवर नहीं किया गया है। वहीं वाटिका इंडिया नेक्स्ट प्रोजेक्ट में भी डिलीवरी पूरी नहीं हो सकी। ईडी के अनुसार, करीब 140.73 करोड़ रुपये मूल्य के प्लॉट अब भी अनडिलीवर्ड हैं।
यानी जिन लोगों ने वर्षों पहले जमीन का सौदा किया, उनके लिए यह मामला सिर्फ पैसा फंसने तक सीमित नहीं रहा, यह उस भरोसे का सवाल भी बन गया है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति बिल्डर को अपनी जीवनभर की कमाई सौंपता है।
पहले प्लॉट, फिर नंबर और लोकेशन बदली:
ईडी की जांच के अनुसार, 2014 और 2015 में प्लॉट-वाइज एग्रीमेंट किए गए थे। इसके बाद प्रोजेक्ट के लेआउट में बदलाव हुआ और पहले आवंटित प्लॉटों को कथित तौर पर रीनंबर और रीलोकेट किया गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि इसी दौरान प्रोजेक्ट की जमीन के दूसरे खरीदारों को आवंटन और बिक्री का सिलसिला भी जारी रहा। यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है, अगर किसी खरीदार से एक निश्चित जमीन का सौदा किया गया था, तो वर्षों बाद उसी जमीन के आवंटन और बिक्री का हिसाब किसके पास था?
खरीदारों के 260 करोड़ का पैसा कहां गया?:
ईडी ने वाटिका लिमिटेड के बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन का विश्लेषण किया है। एजेंसी के मुताबिक, खरीदारों से हासिल रकम का इस्तेमाल केवल उन्हीं परियोजनाओं में नहीं हुआ, जिनके लिए पैसा लिया गया था। जांच में कथित तौर पर रकम को दूसरी ग्रुप कंपनियों और प्रमोटर से जुड़ी ऐसी संस्थाओं में ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है, जो संबंधित परियोजनाओं का हिस्सा नहीं थीं। यही कथित फंड ट्रेल अब ईडी की जांच का अहम हिस्सा है।
22 कंपनियां, लेकिन कारोबार का ढांचा अलग सवाल:
ईडी के अनुसार, प्रोजेक्ट की जमीन करीब 22 ग्रुप कंपनियों के जरिए रखी गई थी। जांच एजेंसी का कहना है कि इन कंपनियों में कर्मचारी या स्वतंत्र कारोबारी गतिविधियां नहीं थीं और उनका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉर्पोरेट गारंटी तथा वित्तीय संस्थानों के साथ लैंड बैंक और मॉर्गेज व्यवस्था के प्रबंधन के लिए किया जाता था। रियल एस्टेट में कंपनी संरचना और जमीन के मालिकाना हक को लेकर यह जांच एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है,जब किसी प्रोजेक्ट की जमीन कई कंपनियों में बंटी हो, तो खरीदार के हित और उसकी जमीन पर वास्तविक अधिकार की निगरानी आखिर कैसे होती है?
रेड में लग्जरी कार से लेकर करोड़ों की संपत्ति तक:
मामले में ईडी पहले ही कई परिसरों की तलाशी ले चुकी है। एजेंसी के अनुसार, एक आवासीय परिसर से Mercedes-Benz GLC 300, करीब 1.3 किलोग्राम से अधिक सोना और हीरे के आभूषण, जिनकी कीमत लगभग 1.55 करोड़ रुपये बताई गई, बरामद किए गए। करीब 3.04 करोड़ रुपये के बैंक खातों और एफडीआर को भी फ्रीज किया गया। ऐसे में जांच का एक अहम पहलू यह भी है कि निवेशकों से प्राप्त रकम और समूह की संपत्तियों के बीच वित्तीय संबंध क्या था।
473 करोड़ का एक और सौदा, 150 प्लॉटों पर सवाल:
ईडी के मुताबिक, वर्ष 2024 के एक अन्य लेन-देन में स्केलर वेंचर्स ने 'सेल एग्रीमेंट' और 'बाय-बैक एग्रीमेंट' के तहत 473.18 करोड़ रुपये का भुगतान किया। 165 प्लॉटों में से केवल 15 प्लॉट वापस खरीदे गए। जांच एजेंसी का आरोप है कि बाकी 150 प्लॉटों में से 14 को स्केलर की जानकारी या सहमति के बिना करीब 13.62 करोड़ रुपये में तीसरे पक्ष को बेच दिया गया। ईडी के अनुसार, इस लेन-देन में फिलहाल चिन्हित अपराध की कमाई करीब 154.36 करोड़ रुपये है।
बड़े फैसलों पर दो लोगों का नियंत्रण?:
जांच एजेंसी का दावा है कि अनिल भल्ला ने संबंधित लेन-देन से जुड़े प्रमुख फैसलों की निगरानी की, जबकि गौतम भल्ला ने महत्वपूर्ण समझौतों को अमल में लाने और जमीन रखने वाली संस्थाओं के संचालन में अहम भूमिका निभाई। ईडी के मुताबिक, उपलब्ध दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि कई बड़े फैसले दोनों के बीच संयुक्त रूप से लिए गए। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि खरीदारों से प्राप्त रकम का पूरा प्रवाह क्या रहा और कथित तौर पर इससे कौन-कौन सी संपत्तियां या लेन-देन जुड़े।
बिल्डर पर सवाल ही नहीं, सिस्टम की निगरानी भी जांच के घेरे में:
यह मामला सिर्फ एक रियल एस्टेट समूह के खिलाफ जांच के रूप में नहीं देखा जा रहा। इतने लंबे समय तक किसी प्रोजेक्ट में खरीदारों का पैसा लगा रहना, जमीन के आवंटन में बदलाव, कंपनियों के बीच जमीन और रकम का आवागमन तथा डिलीवरी में वर्षों की देरी, ये सभी रियल एस्टेट नियमन और निगरानी की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खरीदार वर्षों तक प्लॉट के लिए इंतजार कर रहे हों, तो प्रोजेक्ट की जमीन, लाइसेंस, फंड फ्लो और बिक्री की निगरानी करने वाली व्यवस्था को इसकी भनक कब और कैसे लगती है?
हालांकि, किसी नियामकीय या सरकारी विभाग की भूमिका पर निष्कर्ष निकालना जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही संभव होगा। ईडी की मौजूदा कार्रवाई में फिलहाल मुख्य फोकस कथित मनी लॉन्ड्रिंग, फंड के डायवर्जन और संपत्तियों से जुड़े वित्तीय लेन-देन पर है।
अब आगे क्या?
अनिल भल्ला और गौतम भल्ला की गिरफ्तारी के बाद ईडी की जांच का दायरा और बढ़ सकता है। एजेंसी बैंकिंग लेन-देन, कंपनियों के बीच फंड ट्रांसफर, जमीन के स्वामित्व, प्लॉट आवंटन और कथित तीसरे पक्ष की बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल कर रही है। इस मामले में अंतिम दोषसिद्धि अदालत के निर्णय पर निर्भर करेगी। फिलहाल ईडी के आरोप और जांच के निष्कर्ष जांच की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

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