कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं: संजय मग्गू
कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं
संजय मग्गू
बताइए, क्या जमाना आ गया है। रोने, अपनी पीड़ा किसी अनजान व्यक्ति के सामने सुनाने के लिए भी क्राइंग क्लब खुलने लगे हैं। इसके लिए बाकायदा घंटे के हिसाब से फीस भी देनी पड़ती है। देश के कई हिस्सों में खुले यह क्राइंग क्लब आपको आपके दुख के हिसाब से चार्ज भी करते हैं। क्या सचमुच हम अपने घर, परिवार, यार-दोस्तों से इतने कट गए हैं कि हमें रोने के लिए भी किसी दूसरे की सहायता लेनी पड़ रही है। यह सच है कि जैसे-जैसे जीवन शैली बदल रही है, लोग समाज से कटते जा रहे हैं। आज से तीन-चार दशक पहले तक इंसान दिन में एक बार जरूर अपने परिवार, हित-मित्रों के साथ घंटे-आधे घंटे बैठता था। खूब गप्पें लड़ाए जाते थे। हंसी-ठिठोली होती थी। इसी दौरान लोग अपने मन की पीड़ा को भी बता देते थे। सारे लोग मिलकर एक दूसरे की पीड़ा सुनकर उसका निदान खोजने की कोशिश करते थे। लोग भी इतने विश्वसनीय होते थे कि वह एक की पीड़ा का अंदाजा दूसरे को नहीं लगने देते थे। हंसी भी नहीं उड़ाते थे। हर दोस्त कमीना होते हुए भी दोस्त की पीड़ा को सुनकर खुद दुखी हो जाता था। उसे लगने लगता था कि यह उसका ही दुख है। गांव और शहर में शाम को होने वाली बैठकें लोगों के सुख-दुख की गाथाओं से भरी रहती थीं। लोग भावनाओं में बहकर अपने घर की पोल तक खोल दिया करते थे, लेकिन मजाल है कि यह बात किसी दूसरे को पता चल जाए। आज दोस्तों, रिश्तेदारों, भाई-बहन, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, बेटा-बेटी के होते हुए भी इंसान अकेला है। हर इंसान को यही लगता है कि कहीं इसके सामने हमने अपना दुखड़ा रोया और यह सबके सामने गा-गाकर बताएगा। फिर स्टेट्स, ईगो, अमीरी-गरीबी का फर्क भी अब आड़े आने लगा है। बचपन का दोस्त है, लेकिन अगर स्टेट्स में थोड़ा बहुत कम है, तो उसके सामने कैसे रोया जाए, अपने दिल की भड़ास निकाली जाए। इससे बेहतर है कि कुछ रुपये देकर किसी अंजान के सामने जार-जार रोकर अपने दुख को कम कर लिया जाए। आज लोगों की यही मनोवृत्ति हो गई है। यही कारण है कि सन 1917 में गुजरात के सूरत में देश में खुलने वाला पहला क्राइंग क्लब आज कई शहरों में खुल चुका है। यह कैसी विडंबना है कि हंसने और रोने के लिए क्लब खुलने लगे हैं। इन क्लबों में हंसना और रोना सिखाया जाता है, जबकि हंसना और रोना प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। जब बच्चा पैदा होता है, तो वह सबसे पहले रोता ही है। रोना प्रकृति सिखा देती है, नवजात को रोना सिखाने के लिए कोई क्लब नहीं होता है। वैसे ही उस बच्चे को हंसना और मुस्कुराना सिखाने के लिए कोई स्कूल नहीं खोला जाता है। कितने अफसोस की बात है कि इंसान हंसना, रोना और मुस्कुराना भूलता जा रहा है। सोचकर देखिए, आप दिन भर में कितनी बार अतीत या वर्तमान की किसी घटना को याद करके मुस्कुराए हैं। अपने घर-परिवार में अपनी पीड़ा बताते समय आपकी आंखों में आंसू आए हों। शायद एक बार भी नहीं।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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