इंसानी मस्तिष्क को धीरे-धीरे कुंद करता जा रहा एआई

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संजय मग्गू

एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव जाति के लिए खतरा है, उस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो वह चार-पांच साल में मानव जाति को ही खत्म कर देगा। ऐसी आशंका एआई निर्माता कंपनियों के प्रमुख पदाधिकारी जता रहे हैं। एंथ्रोपिक के शोधकर्ता जैकब काक्सन ने तो दो हफ्ते पहले एआई को मानव जाति के लिए खतरनाक बताकर अपनी कंपनी से इस्तीफा तक दे दिया है। एंथ्रोपिक, ओपनएआई, मेटा और गूगल जैसी कंपनियां भी एआई खतरों को लेकर चेतावनी देने लगी हैं। इन कंपनियों की बात से दुनिया के सबसे अमीर माने जाने वाले एलन मस्क भी सहमत हैं। अब एआई से संचालित होने वाले उपकरण यानी रोबोट्स आदि मानव जाति का विनाश करेंगे या नहीं, यह अभी दूर की कौड़ी है। मैं इस आशंका से इनकार नहीं करता हूं, लेकिन एक बात डंके की चोट पर कहना चाहता हूं और वह यह कि एआई मानव मस्तिष्क को कमजोर, निष्क्रिय और निकम्मा बनाने की ओर बढ़ चला है। वैसे इस काम की शुरुआत कैलकुलेटर ने आज से चालीस-पचास साल पहले ही कर दी थी, लेकिन उसका प्रभाव बहुत सीमित था। लेकिन इस एआई ने हमारी नई पीढ़ी की सोचने-समझने और विश्लेषण करने की क्षमता छीनता जा रहा है। स्कूल और कालेजों में हर विषय का अध्यापक कक्षा में अपने विद्यार्थियों को हर बात बारीकी से समझाता है।

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गणित हो, विज्ञान हो या कोई दूसरा विषय, अध्यापक हर पहलू पर विस्तार से चर्चा करता है, हर विद्यार्थी अपनी-अपनी क्षमता के मुताबिक उसको ग्रहण करने की कोशिश करता है। यदि कोई बात नहीं समझ में आती है, तो वह दोबारा पूछता है, लेकिन एआई केवल उत्तर देता है, प्रक्रिया नहीं बताता है। एआई से पूछो, सत्रह को पांच से गुणा करने पर क्या आएगा, तो वह सीधा उत्तर दे देगा-पच्चासी। लेकिन पच्चासी उत्तर आया कैसे? यह एआई या कैलकुलेटर नहीं बताता है। जबकि वहीं क्लास में टीचर सत्रह को पांच बार ऊपर नीचे लिखकर उसे जोड़ेगा और फिर बताएगा कि ऐसे सही उत्तर आता है। बच्चों को टेबल के माध्यम से सिखाया जाएगा कि सत्रह को पांच से गुणा करने पर पच्चासी आएगा। यह तो हुई एक प्रक्रिया। इस विधि से छात्र एक बात समझ जाते हैं कि किसी भी संख्या को दूसरी किसी संख्या से गुणा करने का भी यही तरीका है। एआई बस यही तरीका नहीं बताता है। नतीजा यह होता है कि एआई का इस्तेमाल करने वाला विद्यार्थी कोई भी सवाल कैसे हल किया जाता है, यह नहीं जान पाता है। वह केवल उत्तर जानता है, प्रक्रिया नहीं। हर सवाल, हर समस्या को सुलझाने की जो प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है और जो मानव मस्तिष्क को विकसित करने का सबसे बड़ा साधन है, उससे एआई विरक्त कर रहा है। सोचने, समझने, याद रखने और किसी भी घटना या समस्या का विश्लेषण करने की मानवीय क्षमता है, उससे लोगों को दरकिनार करके  उन्हें पंगु बना रहा है। यह मानव जाति को बौद्धिक रूप से पंगु बना देने की प्रक्रिया है। यदि इंसानों ने सोचना छोड़ दिया, तो उनका मस्तिष्क छोटा होता जाएगा और वह धीरे-धीरे नर से वानर बनने की ओर अग्रसर होता जाएगा। आज वयस्क मनुष्य के मस्तिष्क का वजन 1300-1400 ग्राम होता है। यदि यही प्रक्रिया जारी रही, तो तीस-चालीस लाख साल पहले की तरह सिर्फ तीन सौ से चार सौ ग्राम का ही रह जाएगा।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्‍स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।

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