अब खुद मुख्तार हो चुकी हैं जेन जेड वाली लड़कियां
संजय मग्गू
देश की राजनीतिक फिजा बड़ी तेजी से बदल रही है। इसके साथ-साथ बदल रही है महिलाओं की अपने अस्तित्व को लेकर सदियों पुरानी मान्यताएं और परपंराएं। याद कीजिए, आज से तीन-चार दशक पहले राजनीतिक मामलों में गांव हो या शहर चुनाव नजदीक आने पर घर का पुरुष तय कर देता था कि वोट किसको देना है। किस चिह्न पर मोहर लगानी है। कमोबोश महिलाएं और बालिग लड़कियां यह बात मान लेती हैं। यदि किसी ने अपनी मर्जी से भी वोट डाला होता था, तो भी वह सबके सामने यही कहती थीं कि जिस चिह्न पर बताया गया था, उसी चिह्न पर मोहर लगाई है। लेकिन अब इस परिदृश्य बदल गया है। चूल्हे-चौके से लेकर सीरियल देखने तक सीमित रहने वाली महिलाओं और लड़कियों ने अब स्वतंत्र रूप से न केवल विचार व्यक्त करना सीख लिया है, बल्कि अन्याय के खिलाफ मुखर विरोध करना भी सीख लिया है। यह बदलाव कोई अचानक नहीं आया है। पूरे ब्रह्मांड में कोई भी घटना अचानक नहीं होती है। किसी भी कार्य यानी घटना के पीछे कारण बहुत पहले से ही मौजूद होते हैं। जैसे-जैसे शिक्षा का विस्तार होता गया, महिलाएं शिक्षित होती गईं, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती गईं। जेन जेड वाली नई पीढ़ी की लड़कियां तो शत-प्रतिशत शिक्षित हैं। ग्रेजुएशन नहीं किया है, तो भी हाई स्कूल-इंटर तक तो जरूर पढ़ी हैं। इस शिक्षा ने उन्हें जागरूक करने के साथ अपने हक के लिए लड़ना सिखाया है। अब कोई भी सरकार खाते में पैसा डालकर जेन जेड में शामिल लड़कियों को अपने पक्ष में वोट डालने के लिए बरगला नहीं सकता है। पिछले छह सात सालों से महिलाओं और लड़कियों के खातों में कुछ न कुछ रकम हर महीने डालने का राजनीतिक चलन देश में जारी है। लेकिन अगर बात 2024 के चुनावों की करें, तो तमाम लाभार्थी योजनाओं के बावजूद महिलाओं ने वोट 65.78 प्रतिशत डाला, जो पुरुषों के मुकाबले कुछ प्रतिशत ज्यादा रहा, लेकिन भाजपा को 37 प्रतिशत पुरुषों और 36 प्रतिशत महिलाओं ने वोट दिया।
मुफ्त का राशन पानी और खाते में पैसा पाने के बावजूद उन्होंने किसी एक पार्टी की जागीर बनने से इनकार कर दिया। चाहे भाजपा हो, कांग्रेस हो या अन्य दल, जहां-जहां भी इन दलों की सरकार है, वहां वहां महिलाओं के लिए कोई न कोई योजना जरूर चल रही है जिसके तहत खाते में डायरेक्ट पैसे डाले जा रहे हैं। यह महिलाओं की जागरूकता और विकसित होती राजनीतिक समझ का एक उदाहरण मात्र है। पिछले कुछ महीनों से लड़कियों ने जिस तरह सड़कों पर उतर अपनी लड़ाई खुद लड़ने का फैसला किया है, उससे यह साबित हो गया है कि महिलाएं और जेन जेड वाली लड़कियां अब खुद मुख्तार हो चुकी हैं। वह अपनी लड़ाई खुद लड़ने की ताकत रखती हैं। अब उन्हें किसी किस्म का लालच देकर बरगला पाना, न तो पुरुषों के लिए संभव रह गया है, न राजनीतिक दलों के लिए कोई उम्मीद बची है। अपना अच्छा बुरा सोचने और उस पर अमल करने की काबिलियत उन्होंने अपने में पैदा कर ली है। यह बदलाव वाकई बहुत ही सुखद है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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