प्राकृतिक आपदाओं के सामने विज्ञान की ताकत फेल: संजय मग्गू

संजय मग्गू
विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। शरीर के भीतर छिपे वायरस को देखने और खोजने से लेकर अंतरिक्ष में ग्रहों और उपग्रहों की निगरानी करने तक में विज्ञान सक्षम है। अब तो हजारों किमी दूर बैठ डॉक्टर आपरेशन तक करता है। मोबाइल से दुनिया के किसी भी कोने में प्रियजन हों, उनसे बात करते हुए लाइव देखा जा सकता है। यह विज्ञान की ताकत है। विज्ञान ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया है। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी विज्ञान ने हस्तक्षेप किया है। बहुत सारी प्राचीन मान्यताएं और परंपराएं विज्ञान ने बदलकर रख दी हैं। इसके बावजूद विज्ञान अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि वह प्रकृति में होने वाली घटनाओं को रोक दे।
इसमें संदेह नहीं कि विज्ञान की वजह से मानव जीवन बहुत ही सरल हो गया है। लेकिन सच बात यह है कि वह अभी प्रकृति पर विजय पाने में सक्षम नहीं हुआ है। आज सेटेलाइट से तस्वीरें और वीडियो देखकर विज्ञान यह बता रहा है कि तिब्बत में ग्लेशियर फटने की घटना क्यों हुई? लेकिन यदि विज्ञान इतना सक्षम होता तो वह एक दिन पहले बता देता कि अमुक समय और अमुक दिन यहां का ग्लेशियर फटने वाला है। तो फिर सैकड़ों लोगों को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ता है। हजारों लोग नेपाल में आए सैलाब में लापता नहीं हुए होते। जिन घरों में आज मातम छाया हुआ है, उनके घरों में आज खुशियां मनाई जा रही होती।
विज्ञान ने यह तो बता दिया है कि तिब्बत में ग्लेशियर के टूटकर नीचे गिरने का कारण ग्लोबल वार्मिंग है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की वजह भी यही विज्ञान ही है। वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति की वजह से दुनिया भर के भाग्य विधाताओं और उद्योगपतियों ने प्रकृति के स्वास्थ्य के बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं समझी। जहां अपना फायदा दिखा, उन्होंने प्रकृति का भरपूर दोहन किया। दुनिया भर के समुद्रों को अपने स्वार्थ के लिए खंगाल डाला। नदियों को प्रदूषित कर दिया। पहाड़ों का सीना चीर कर बस्तियां बसाईं, लंबी-चौड़ी सड़कें बनाईं। धार्मिक स्थलों को पर्यटन स्थलों में बदला। पहाड़ और मैदान में सदियों से जो जंगल फलते-फूलते चले आ रहे थे, उन्हें नेस्तनाबूत भी हम इंसानों ने कर दिया। नतीजा क्या हुआ? नतीजा यह हुआ कि प्रकृति में असंतुलन पैदा हुआ।
ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या पैदा हुई। धरती का तापमान बढ़ा। नदियां और समुद्र कचरे के ढेर हो गए। ऐसी स्थिति में जल में रहने वाली न जाने कितनी प्रजातियां दुनिया से ही विलुप्त हो गईं, हजारों प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। हम इंसान विज्ञान की ताकत के बल पर चंद्रमा और मंगल ग्रह पर मानव बस्तियां बसाने का सपना देख रहे हैं। यह सपना पूरा होगा भी या नहीं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन जिस पृथ्वी पर मानव जीवन है, उस पृथ्वी को हमने अपने कर्मों से नरक बनाकर रख दिया है। यदि मंगल और चंद्रमा पर मानव बस्तियां बस भी गईं, तो इस बार की क्या गारंटी है कि इन ग्रहों और उपग्रहों को नरक नहीं बना देंगे।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।



