Faridabad News : संस्कारित संतान ही परिवार और राष्ट्र का गौरव: महापौर प्रवीण जोशी
आर्य समाज सेक्टर 7ए के तत्वाधान में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य विषय “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में युवा दिग्भ्रमित क्यों” रहा। इस महत्वपूर्ण विषय पर देश की जानी-मानी आर्य विदूषियों ने उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन करते हुए अपने गहन विचार रखे।
आर्य समाज सेक्टर 7ए के तत्वाधान में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य विषय “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में युवा दिग्भ्रमित क्यों” रहा। इस महत्वपूर्ण विषय पर देश की जानी-मानी आर्य विदूषियों ने उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन करते हुए अपने गहन विचार रखे। 
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में फरीदाबाद की महापौर प्रवीण बत्रा जोशी उपस्थित रहीं और उनका पदाधिकारियों द्वारा ओम पट्टिका पहनाकर तथा स्मृति चिह्न के रूप में पौधा भेंट कर स्वागत किया गया। कार्यक्रम का गरिमामयी शुभारंभ भजनोपदेशक आचार्य सतीश सत्यम के देशभक्ति गीतों से हुआ, जिन्होंने राष्ट्रभक्ति का रंग घोला। इसके बाद सुमन बत्रा ने महर्षि दयानंद सरस्वती को समर्पित सुमधुर भजनों की प्रस्तुति देकर पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और भक्तिमय बना दिया। महापौर प्रवीण जोशी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बच्चों में नैतिक मूल्यों के विकास पर बल दिया। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि बचपन से ही माता-पिता को अपने बच्चों को हवन और सत्संग में अपने साथ ले जाना चाहिए, ताकि उन पर अच्छे संस्कार पड़ें और वे चरित्रवान बनें। उन्होने समाज से अपील की कि वे अपने कर्मों को धर्म आधारित बनाएं, ईश्वर के निमित्त श्रेष्ठ कार्य करें और समाज की निस्वार्थ सेवा करें। 'माता निर्माता होती है' का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि माताओं को अपने बच्चों को श्रेष्ठ गुण, कर्म और स्वभाव के सांचे में ढालना चाहिए। एक संस्कारित संतान ही परिवार और राष्ट्र का सच्चा गौरव होती है। आर्य समाज की प्रख्यात विदुषी पदमश्री आचार्या डॉ. सुकामा ने अपने संबोधन में कहा कि महर्षि दयानन्द के अनुसार मनुष्य दो प्रकार की शिक्षा प्राप्त करता है—औपचारिक और अनौपचारिक। विद्यालयों से मिलने वाली औपचारिक शिक्षा से सब कुछ हासिल नहीं होता। अनौपचारिक शिक्षा की शुरुआत माता के गर्भधारण से बहुत पहले ही हो जाती है, जिसका सटीक उदाहरण वीर अभिमन्यु हैं।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के युवाओं में इसी अनौपचारिक शिक्षा की कमी है, जिसके कारण समाज में संस्कारों का ह्रास हो रहा है। अनौपचारिक शिक्षा की नींव सबसे पहले माता रखती है, जिसके बाद बालक पिता और आचार्य के आचरण से सीखता है। आचार्या सुकामा ने बल दिया कि सभी विद्याओं में अध्यात्म विद्या ही परम विद्या है। धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति जीवन में कभी भटक नहीं सकता। यदि मनुष्य के भीतर लोभ और घमंड जैसे दुर्गुण आ जाएं, तो उसका सब कुछ समाप्त हो जाता है। विशिष्ट वक्त्री आचार्या विद्या आर्य ने वर्तमान शिक्षा पद्धति और पारिवारिक ढाँचे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी सबसे उत्तम पूँजी और धन हमारी संतान है। लेकिन आज के दौर में नैतिक मूल्यों और संस्कारों के स्थान पर भौतिक भोग-विलास की वस्तुओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है। पहले परिवारों में संतानें अधिक और सुख-सुविधाएँ कम थीं, फिर भी संस्कार प्रबल थे; आज स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। आज का युवा सोशल मीडिया के अत्यधिक और गलत प्रभाव के कारण दिग्भ्रमित हो रहा है। संयुक्त परिवारों के टूटने से बच्चों की सही देखभाल नहीं हो पा रही है और माता-पिता को यह भी पता नहीं रहता कि बच्चे घर के बाहर क्या कर रहे हैं। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के कमजोर होने से नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है। भजनोपदेशिका आचार्या सुलभा शास्त्री ने महर्षि दयानंद के सामाजिक दर्शन और भजनों के माध्यम से समाज में बढ़ रहे भ्रष्टाचार व व्याभिचार पर चोट की। उन्होंने सोशल मीडिया के दुरुपयोग को युवाओं के भटकाव की बड़ी वजह बताया। उन्होंने सीख दी कि विद्या का उपयोग ज्ञान दान के लिए, शक्ति का प्रयोग कमजोरों की रक्षा के लिए और धन का उपयोग सेवा के लिए होना चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद केवल धर्म-कर्म ही साथ जाता है, धन नहीं। इसलिए माता-पिता अपने बच्चों को संस्कारित करें और वैदिक मूल्यों से जोड़ें। मुख्य अतिथि महापौर तथा आर्य समाज के पदाधिकारियों द्वारा आमंत्रित विदूषियों को 'ओम पट्टिका' पहनाकर और स्मृति चिह्न के रूप में पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का सफल और कुशल मंच संचालन प्रेम बहल द्वारा किया गया। समापन पर प्रधान निष्ठाकर आर्य ने मुख्य अतिथि सहित सभी आमंत्रित विदूषियों का उनके ओजस्वी विचारों और प्रेरणादायी मार्गदर्शन के लिए विशेष रूप से धन्यवाद प्रेषित किया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी गणमान्य नागरिकों और श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति इस भव्य कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आभार प्रकट किया। इस अवसर पर आचार्य ऋषिपाल, देशबन्धु आर्य, सतीश कौशिक, जिले सिंह आर्य, वसु मित्र सत्यार्थी, शशांक कौशिक, प्रतीक गुप्ता, जितेन्द्र सरल, जितेन्द्र सिंह आर्य, साकेत कौशिक, प्रकाश वती, संघमित्रा कौशिक, ऊषा सेठी, रचना धनखड़, रजनी बत्रा, सविता सचदेवा, रजनी भाटिया तथा समाज के कई गणमान्य नागरिक, प्रबुद्ध जन और मातृशक्ति बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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