उटावड़ महापंचायत क्या एक छुपा हुआ एजेंडा था, आखिर क्यों साबित हुई ढकोसला
पंचायत के फैसले कागज़ों तक सीमित, दो महीना बाद भी नहीं हो सकती दूसरी पंचायत
15 फरवरी 2026 को उटावड़ मोड़ पर आयोजित की गई बहुचर्चित महापंचायत, जिसका उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों को खत्म करना बताया गया था, अब खुद सवालों के घेरे में है। पंचायत में लिए गए फैसले—जैसे शादियों में फिजूलखर्ची पर रोक, डीजे और नाच-गाने पर पाबंदी, दहेज प्रदर्शन को खत्म करना और बरातों में वाहनों की संख्या सीमित करना—आज ज़मीन पर पूरी तरह विफल नजर आ रहे हैं।
नूंह/मेवात: 15 फरवरी 2026 को उटावड़ मोड़ पर आयोजित की गई बहुचर्चित महापंचायत, जिसका उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों को खत्म करना बताया गया था, अब खुद सवालों के घेरे में है। पंचायत में लिए गए फैसले—जैसे शादियों में फिजूलखर्ची पर रोक, डीजे और नाच-गाने पर पाबंदी, दहेज प्रदर्शन को खत्म करना और बरातों में वाहनों की संख्या सीमित करना—आज ज़मीन पर पूरी तरह विफल नजर आ रहे हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट और स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर सामने आया है कि पंचायत के कुछ ही दिनों बाद हालात पहले से भी ज्यादा बिगड़ गए हैं। शादी-ब्याह में लंबी-लंबी गाड़ियों के काफिले, लाखों रुपये की मालाओं की नुमाइश, डीजे और नाच-गाना खुलेआम जारी है। कई जगह तो इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, जिससे आम लोगों में निराशा और अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पंचायत के आयोजकों और समाज के तथाकथित रहनुमाओं की दोहरी भूमिका ने इस पूरी कवायद को “ढकोसला” बना दिया है। लोगो का मानना है “जो लोग मंच से नियम लागू करने की बात कर रहे थे, वही अपने घर की शादियों में इन नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। इससे समाज में गलत संदेश जा रहा है।”वही लोगो का मानना है कि बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के दोबारा विचार-विमर्श कर ठोस कदम उठाने होंगे नहीं तो ये बुराइयां एक कैंसर जैसा रूप बन जाएंगी।
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फैसलों पर अमल नहीं, बढ़ी दिखावे की होड़: मेवात क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में शादियों में खर्च का स्तर तेजी से बढ़ा है। स्थानीय सामाजिक संगठनों के अनुसार, औसतन एक मध्यमवर्गीय परिवार शादी में 10 से 25 लाख रुपये तक खर्च कर रहा है, जिसमें सबसे ज्यादा पैसा वाहनों के काफिले, डीजे, सजावट और दहेज प्रदर्शन पर खर्च होता है। पंचायत का उद्देश्य इसी खर्च को सीमित करना था, लेकिन अब हालात उल्टे दिखाई दे रहे हैं। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि पंचायत के फैसलों के बावजूद बारातों में 50 से 100 गाड़ियों तक का काफिला शामिल हो रहा है, जबकि पंचायत में इसे 10-15 तक सीमित करने की बात कही गई थी। इसी तरह, दूल्हों को लाखों रुपये की मालाएं पहनाने और सोशल मीडिया पर इसका प्रदर्शन करने की प्रवृत्ति भी लगातार बढ़ रही है।
छिपे एजेंडे का आरोप: उटावड़ मोड़ पर 15 फरवरी को हुई महा पंचायत के बाद अभितक कोई दूसरी पंचायत ने होने पर पंचायत की नीयत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जब उटावड़ पंचायत में फैसला लिया था कि ईद के तुरत बाद पुनहाना या फिरोजपुर झिरका में पंचायत आयोजित होगी। वरिष्ठ एडवोकेट एवं सामाजिक कार्यकर्ता ताहिर हुसैन देवला का मानना है कि इस तरह की बड़ी पंचायतें अब समाज सुधार के बजाय व्यक्तिगत और राजनीतिक हित साधने का जरिया बनती जा रही हैं। उनका आरोप है कि पंचायत के पीछे कुछ लोगों का निजी एजेंडा होता है, जिसे आम जनता समझ नहीं पाती। वरिष्ठ सामाजिक विश्लेषक एडवोकेट रमजान चौधरी का कहना है, “जब पंचायत के आयोजक ही अपने फैसलों का पालन नहीं करते, तो यह साफ संकेत है कि पंचायत का उद्देश्य समाज सुधार नहीं, बल्कि दिखावा और प्रभाव जमाना था।”
बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के दोबारा विचार-विमर्श कर ठोस कदम उठाने होंगे: समाजसेवी एडवोकेट अब्दुल रशीद ने कहा कि 15 फरवरी को उटावड़ में हुई महापंचायत में लिए गए फैसले पूरी तरह सही और समाजहित में थे, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम और कमेटियों का गठन न होने के कारण ये फैसले जमीन पर लागू नहीं हो सके। इससे पूरे इलाके में निराशा फैली है, क्योंकि लोगों को इस पंचायत से बड़ी उम्मीदें थीं। उन्होंने कहा कि अगर हम अब भी चुप बैठे रहे तो बुराइयां और बढ़ेंगी। जरूरत है कि बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के दोबारा विचार-विमर्श कर ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि समाज को बिगड़ने से बचाया जा सके।
उलेमा की भूमिका पर भी बहस।: इस महापंचायत में उलेमा को प्रमुख भूमिका में रखा गया था, लेकिन अब इस फैसले पर भी बहस शुरू हो गई है। कुछ लोगों का कहना है कि धार्मिक विद्वानों को पंचायत का अध्यक्ष बनाकर लोगों की भावनाओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई, जबकि असल निर्णय लेने वाले लोग पर्दे के पीछे रहे। आलोचकों का मानना है कि पंचायत का नेतृत्व राजनेताओं की बजाए ऐसे अनुभवी और प्रभावशाली पंचों चौधरियों को करना चाहिए था जो सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर फैसलों को लागू करा सकें। पंचायत की राजनेताओं के हाथ में कमान होने के चलते अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने“आलिम-ए-दीन को तो आगे कर दिया गया, लेकिन उन्हें असल मंशा का अंदाजा ही नहीं था। अब जब फैसले टूट रहे हैं, तो उनकी साख पर भी असर पड़ रहा है।”

अवाम में बढ़ता अविश्वास: इन घटनाओं के बाद आम जनता में पंचायतों को लेकर भरोसा कम होता जा रहा है। लोगों का कहना है कि अगर इस तरह के फैसलों का पालन नहीं होना है, तो ऐसी पंचायतों का कोई मतलब नहीं रह जाता।युवा वर्ग में भी नाराजगी देखने को मिल रही है। कई युवाओं का कहना है कि समाज में सुधार के नाम पर केवल भाषणबाजी हो रही है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं है। इससे नई पीढ़ी पंचायत व्यवस्था से दूर होती जा रही है।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समाज को वास्तव में सुधारना है, तो केवल पंचायतें आयोजित करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उनके फैसलों को लागू करने के लिए ठोस रणनीति और ईमानदारी जरूरी है। साथ ही, समाज के प्रभावशाली लोगों को खुद उदाहरण बनकर दिखाना होगा। फिलहाल उटावड़ महापंचायत एक ऐसे उदाहरण के रूप में सामने आई है, जहां बड़े-बड़े दावे तो किए गए, लेकिन अमल के स्तर पर सब कुछ विफल रहा। अब देखना होगा कि समाज इस अनुभव से क्या सीख लेता है और भविष्य में ऐसी पंचायतों की विश्वसनीयता कैसे बहाल की जाती है।


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