आनंद तो चहुंओर बिखरा पड़ा है, महसूस तो करो : संजय मग्गू

संजय मग्गू
महात्मा बुद्ध ने विक्षिप्त पट्टाचारा से भी तो यही कहा-मरण एक अविचल सत्य है, उससे बचा नहीं जा सकता है। कोई कितना ही दुखी क्यों न हो, मरण नहीं रुकता है। सो, कौन किसके लिए शोक करे। पट्टाचारा ने अपने घर से भागकर किशोरावस्था में पड़ोस में रहने वाले अपने प्रेमी के साथ विवाह किया था। पितृगृह को त्यागकर दूसरे शहर में गृहस्थी बसाई थी। चार साल में वह दो बच्चे की मां बनी थी। जब वह दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी, तो वह अपने पति और दो साल के बेटे के साथ पितृगृह जा रही थी। रास्ते में ही प्रसव पीड़ा हुई और दूसरे पुत्र को जन्म दिया। आग जलाने के लिए लकड़ी लाने गए पति को सर्प ने डस लिया जिससे उसकी मौत हो गई थी। नवजात शिशु को सियार उठा ले गया और पहला बेटा नदी में बह गया। एक ही घंटे में पति और दोनों पुत्र की मौत से पागल हो उठी थी पट्टाचारा। रोती-बिलखती पगलाई सी अपने पिता के घर पहुंची, तो पता चला कि माता-पिता की मौत हो चुकी है। जिस दिन वह अपने पिता के यहां पहुंची थी, उसके इकलौते भाई की मौत भी उसी दिन हुई थी। सास-ससुर भी बूढ़े हो चुके थे। नतीजा यह हुआ कि वह पागलों की तरह इधर उधर घूमने लगी। एक दिन महात्मा बुद्ध नगर में पधारे, तो कुछ लोगों ने पट्टाचारा को बुद्ध के सामने प्रस्तुत कर दिया। तथागत ने उसके शोक को समझा और उसे जीवन मरण, शोक-आनंद के बारे में बताया। उसका शोक खत्म हुआ, तो वह भिक्षुणी बन गई। हम सबकी हालत भी पट्टाचारा से अलग नहीं है। हमें जीवन में जब जब शोक मिला, दुख-तकलीफ मिली, उसका पूरा इतिहास हमारे पास मौजूद है। एक एक घटनाएं याद हैं, लेकिन आनंद में हम कब रहे, यह कतई याद नहीं है। हमारे मित्र ने हमें कब और क्या कड़वी बात कही थी, उसका एक-एक वाक्य, एक एक भंगिमा तक याद है। पति या पत्नी ने कब अवहेलना की थी, माता-पिता ने कब डांटा था, किस बात के लिए डांटा था, भले ही कई साल बीत गए हों, लेकिन पूरा वाकया ज्यों का त्यों याद है। विचारकों का कहना है कि इंसान हमेशा आनंद को खोजता है। वह आनंद खोजी है। लेकिन वास्तविक जीवन में इसके प्रमाण कतई नहीं मिलते हैं। ओशो कहते हैं कि यदि इंसान आनंद को खोजता फिरता, तो जीवन में आनंद की कुछ झलक तो होती। यदि आनंद किसी के पास होता, तो वह उसी तरह लोगों में बांटता फिरता जिस प्रकार अपने दुखों को बांटता फिरता है। आदमी अपने दुख तो दूसरों को बताकर अपने दिल को हलका कर लेता है, लेकिन सुख या आनंद के क्षणों को अकेले ही जीने की कोशिश करता है। आनंद में वह किसी को सहभागी नहीं बनाना चाहता है। आनंद तो बांटने की चीज है। ताकि दूसरे लोग भी हमारे आनंद से आनंदित हों। इंसान यह भूल चुका है कि आनंद तो प्रकृति में चारों ओर बिखरा पड़ा है। हवा की स्वर लहरियों में, पानी की कल-कल ध्वनि में, पक्षियों के कलरव में, पर्वतों के मौन में, समुद्र की गहराइयों में। बस, उसे महसूस करने की जरूरता है। उसे अपने में समाहित करने की कला आनी चाहिए।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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