Chandigarh News: "मैं सात बार अंबाला छावनी से विधायक हूं,फ्री होल्ड नीतिपर मुझसे राय तक नहीं ली गई":अनिल विज
स्थायी मालिकाना हक की उम्मीद के बीच भारी शुल्क, पुराने दस्तावेजों की अनिवार्यता और भुगतान की शर्तों ने बढ़ाई चिंता अनिल विज ने सरकार के सामने उठाए छह बड़े सवाल
हरियाणा सरकार की प्रस्तावित फ्री होल्ड पॉलिसी इन दिनों प्रदेश की सबसे चर्चित नीतियों में शामिल हो गई है। सरकार इसे लीजधारकों को स्थायी स्वामित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन विशेष रूप से अंबाला छावनी में इस नीति को लेकर उत्साह से अधिक संशय और असंतोष दिखाई दे रहा है।
चंडीगढ़: हरियाणा सरकार की प्रस्तावित फ्री होल्ड पॉलिसी इन दिनों प्रदेश की सबसे चर्चित नीतियों में शामिल हो गई है। सरकार इसे लीजधारकों को स्थायी स्वामित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन विशेष रूप से अंबाला छावनी में इस नीति को लेकर उत्साह से अधिक संशय और असंतोष दिखाई दे रहा है। दशकों से लीज पर रह रहे हजारों परिवार स्थायी मालिकाना हक तो चाहते हैं, लेकिन प्रस्तावित शुल्क, कठोर भुगतान व्यवस्था और 150 वर्ष पुराने दस्तावेजों की शर्त ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
मामले ने अब राजनीतिक रूप भी ले लिया है। हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि यदि जनता के हितों की अनदेखी हुई और लोगों को आंदोलन करना पड़ा तो वह सरकार के बजाय जनता के साथ खड़े होंगे। उनका यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह लगातार सात बार अंबाला छावनी से विधायक चुने जा चुके हैं और इस क्षेत्र की जमीन से जुड़े विवादों को करीब से जानते हैं।

क्या है फ्री होल्ड पॉलिसी?
फ्री होल्ड व्यवस्था का अर्थ है कि लीज पर दी गई संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नियमों और शुल्क के आधार पर स्थायी रूप से संबंधित व्यक्ति के नाम कर दिया जाए। इसके बाद संपत्ति का मालिक उसे बेच सकता है, खरीद सकता है, बैंक से ऋण ले सकता है, उत्तराधिकारियों के नाम हस्तांतरित कर सकता है और विकास संबंधी सभी कानूनी प्रक्रियाएं आसानी से पूरी कर सकता है।
अभी तक लीज होल्ड संपत्तियों के कारण हजारों परिवारों को बैंक ऋण, रजिस्ट्री, नक्शा स्वीकृति और अन्य प्रशासनिक कार्यों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसलिए सिद्धांत रूप में लोग फ्री होल्ड व्यवस्था का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि यह नीति राहत देने वाली होनी चाहिए, बोझ बढ़ाने वाली नहीं।
अंबाला छावनी की 150 साल पुरानी विरासत
अंबाला छावनी का इतिहास ब्रिटिश शासन से जुड़ा हुआ है। यहां बड़ी संख्या में कोठियां, दुकानें और मकान ऐसी जमीनों पर बने हैं जो वर्षों पहले लीज पर दी गई थीं। तीन-चार पीढ़ियां इन्हीं संपत्तियों में रह रही हैं। समय के साथ परिवार बढ़े, संपत्तियां बंटी, लेकिन स्वामित्व का प्रश्न आज भी पूरी तरह हल नहीं हो सका।
इसी कारण यहां के लोगों को लंबे समय से ऐसी नीति का इंतजार था जो उन्हें स्थायी मालिकाना अधिकार दिला सके। लेकिन अब जब नीति का प्रारूप सामने आया है तो लोगों का कहना है कि इसकी शर्तें इतनी कठिन हैं कि अधिकांश परिवार इसका लाभ ही नहीं उठा पाएंगे।
1977 का समझौता और जमीन का इतिहास
अनिल विज के अनुसार अंबाला छावनी की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक घटनाक्रम को जानना जरूरी है। उन्होंने बताया कि 5 फरवरी 1977 तक यह पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में था। उस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में लगभग 1063 एकड़ भूमि कैंटोनमेंट से अलग कर नगर पालिका को सौंपने का निर्णय हुआ।
समझौते के तहत हरियाणा सरकार को भारत सरकार की जमीन का स्वामित्व मिलना था, जबकि बदले में सेना को 150 एकड़ जमीन उपलब्ध करानी थी। विज का कहना है कि लंबे समय तक इस समझौते पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। बाद में उनके प्रयासों से सेना को 150 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई गई और समझौते को लागू कराया गया।
इसके बाद रजिस्ट्रियों में केवल भवन का उल्लेख होने लगा जबकि जमीन का स्वामित्व सरकार के नाम दर्ज किया जाने लगा। यहीं से लोगों की व्यावहारिक समस्याएं बढ़ती चली गईं।
क्यों बढ़ा लोगों का विरोध?
फ्री होल्ड पॉलिसी के प्रारूप में शामिल कुछ प्रस्तावित प्रावधान लोगों के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण बन गए हैं। अनिल विज ने वकीलों और विशेषज्ञों के साथ प्रारूप का अध्ययन करने के बाद छह प्रमुख आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि पूरी जमीन का मूल्य कलेक्टर रेट के आधार पर जमा करना होगा। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति के पास एक हजार गज जमीन है और कलेक्टर रेट 60 हजार रुपये प्रति गज है तो उसे करोड़ों रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना लगभग असंभव माना जा रहा है।
दूसरी शर्त के अनुसार आवेदन के समय ही कुल राशि का 25 प्रतिशत जमा कराना होगा। शेष 75 प्रतिशत राशि एक वर्ष के भीतर जमा करनी होगी। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं हुआ तो संपत्ति सील किए जाने और सरकार द्वारा कब्जा लेने जैसी कार्रवाई का भी प्रावधान प्रस्तावित है। इतना ही नहीं, बाद में सरकार उस संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को आवंटित भी कर सकती है।
सबसे अधिक विवाद उस शर्त पर है जिसमें करीब 150 वर्ष पुराने मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने की बात कही गई है। अधिकांश परिवारों का कहना है कि इतने पुराने कागजात उनके पास सुरक्षित नहीं हैं। समय के साथ दस्तावेज नष्ट हो गए या पीढ़ियों के बदलाव में खो गए। ऐसे में हजारों परिवार केवल दस्तावेजों के अभाव में अपने अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
अनिल विज ने क्यों जताई नाराजगी?
अनिल विज ने इस पूरे मामले में अपनी नाराजगी खुलकर व्यक्त की है। उनका कहना है कि वह सात बार अंबाला छावनी से विधायक चुने जा चुके हैं और इस क्षेत्र की जमीन संबंधी समस्याओं को सबसे बेहतर तरीके से समझते हैं।
उनके अनुसार जब कैबिनेट बैठक में इस नीति का एजेंडा आया तो उन्होंने मुख्यमंत्री से स्पष्ट कहा कि इतनी महत्वपूर्ण नीति पर उनसे कोई राय नहीं ली गई। उन्होंने सुझाव दिया कि पहले सभी हितधारकों, जनप्रतिनिधियों और विशेषज्ञों की राय ली जाए, उसके बाद ही अंतिम निर्णय किया जाए। उनके विरोध के बाद एजेंडा फिलहाल स्थगित कर दिया गया।
विज का कहना है कि उनका पहला प्रयास सरकार के भीतर रहकर नीति में आवश्यक बदलाव करवाने का होगा, लेकिन यदि जनता की बात नहीं सुनी गई और आंदोलन की नौबत आई तो वह जनता के साथ खड़े होंगे।
जनता क्या चाहती है?
अंबाला छावनी के विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और स्थानीय लोगों की प्रमुख मांगें हैं कि—
कलेक्टर रेट के स्थान पर रियायती दर तय की जाए।
25 प्रतिशत अग्रिम राशि घटाकर 10 प्रतिशत की जाए।
शेष राशि जमा करने के लिए कम से कम पांच वर्ष का समय दिया जाए।
पुराने मूल दस्तावेजों के स्थान पर बिजली बिल, संपत्ति कर रसीद, पानी के बिल, पुराने रिकॉर्ड या अन्य सरकारी दस्तावेजों को भी वैध प्रमाण माना जाए।
पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन, पारदर्शी और समयबद्ध बनाई जाए ताकि लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
लोगों का कहना है कि यदि नीति का उद्देश्य राहत देना है तो उसकी शर्तें भी व्यावहारिक होनी चाहिए।
अर्थव्यवस्था को मिल सकता है बड़ा लाभ
रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यवहारिक और सरल फ्री होल्ड नीति लागू होती है तो अंबाला छावनी की संपत्तियों का बाजार मूल्य उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है। संपत्तियों की खरीद-फरोख्त आसान होगी और निवेशकों का विश्वास भी बढ़ेगा।
बैंकिंग क्षेत्र को भी इसका लाभ मिलेगा क्योंकि वर्तमान में अधिकांश लीज होल्ड संपत्तियों पर ऋण देने में कठिनाई होती है। फ्री होल्ड होने के बाद हजारों परिवार मकान निर्माण, व्यवसाय विस्तार और अन्य आवश्यकताओं के लिए बैंक ऋण प्राप्त कर सकेंगे। इससे स्थानीय व्यापार और रोजगार को भी गति मिलने की संभावना है।
सरकार के सामने चुनौती
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सरकार इस नीति को किस स्वरूप में लागू करती है। यदि जनता और जनप्रतिनिधियों के सुझावों को स्वीकार कर शुल्क और शर्तों में आवश्यक संशोधन किए जाते हैं तो यह नीति वास्तव में ऐतिहासिक साबित हो सकती है।
लेकिन यदि भारी आर्थिक बोझ, कठोर भुगतान व्यवस्था और पुराने दस्तावेजों जैसी शर्तें यथावत रहीं तो यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप भी ले सकता है। अंबाला छावनी में पहले से ही इस विषय पर जनचर्चा तेज हो चुकी है और लोग सरकार के अगले कदम पर नजर लगाए हुए हैं।
निष्कर्ष : राहत का रास्ता या नई परेशानी?
फ्री होल्ड पॉलिसी का मूल उद्देश्य वर्षों से लीज होल्ड संपत्तियों में रह रहे परिवारों को स्थायी मालिकाना हक देना है। यदि यह उद्देश्य लोगों की आर्थिक क्षमता और जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पूरा किया गया तो हजारों परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। लेकिन यदि नीति केवल कागजी औपचारिकताओं और भारी आर्थिक शर्तों तक सीमित रह गई तो यह जनहित की बजाय विवाद का कारण बन सकती है।
सरकार के सामने चुनौती यही है कि वह अधिकार और व्यवहारिकता के बीच संतुलन बनाए। क्योंकि नीति की सफलता केवल उसके कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली वास्तविक राहत से तय होगी।
कोट:
"मैं सात बार अंबाला छावनी से विधायक हूं। इतनी बड़ी नीति और मुझसे राय तक नहीं ली गई। यदि जनता को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा तो मैं सरकार के साथ नहीं, बल्कि जनता के साथ खड़ा रहूंगा। जरूरत पड़ी तो धरने, प्रदर्शन और रैलियों में भी शामिल होऊंगा।"
— अनिल विज, ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री, हरियाणा सरकार

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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