होर्मुज जलडमरूमध्य पर जंग क्यों ? सबके अपने-अपने समुद्री क्षेत्र तो ईरान का क्यों नहीं?

हुर्मुज का समुद्री रास्ता क्यों बन रहा वर्ल्ड वार की वजह? दादागिरी अमेरिका /ईरान !

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 संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के अनुसार, तटवर्तीय क्षेत्रों से 200 समुद्री मील या लगभग 370 किमी तक जितने भी संसाधन होते है उनका उपयोग देश कर सकता है।  इसे अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) कहा जाता है। इसमें  मछली पकड़ना, खनन और ऊर्जा उत्पादन आदि किया जा सकता है। तो ईरान का होर्मुज पर अधिकार क्यों नहीं ? ईरान अमेरिका जंग क्यों बन रही वर्ल्ड वार की वजह जानेंगे इस लेख में। 

 

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समुद्र तट से सटे देशों की सुरक्षा को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 10 दिसंबर 1982 को जमैका के मोंटेगो में एक कानून पारित किया गया। जिसमे कहा गया कि तटरेखा से 12 समुद्री मील तक देश का पूर्ण अधिकार होगा। जबकि विशेषाधिकार के रूप में 200 मील तक जो संसाधन है उनका उपयोग क्षेत्रीय देश उठा सकते हैं। इसके आगे अंतरराष्ट्रीय सीमा शुरू होगी जिस पर सबका अधिकार होगा। इस समझौते का नाम रखा गया संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन यानि (UNCLOS) । भले ही कानून 1984 में बन गया था लेकिन आधिकारिक रूप से लागू हुआ 16 नवंबर 1994 को। 

समुद्र में 12 मील तक कड़ी सुरक्षा का अधिकार। 
दुनिया का 80 प्रतिशत व्यापार समुद्री रास्तों से होता है। लेकिन समुद्र से जुड़े जो तटवर्तीय देश हैं उनकी सुरक्षा के लिए सागर, महासागर और समुद्र पर अधिकार को लेकर कुछ कानून बनाये गए। जिसमें 12 समुद्री मील तक देश अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए सभी उपाय कर सकता है। समुद्र पर निगरानी रख सकता, पनडुब्बियों और शिप से गश्त कर सकता है। सुरक्षा के लिए हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन हां फ्रेंडली रूप से गुजरने वाले शिप यहाँ से गुजर सकते हैं। ये एक आपसी सहमति या संधि होती है। 

200 मील तक आर्थिक क्षेत्रों पर अधिकार। 
 संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के अनुसार, तटवर्तीय क्षेत्रों से 200 समुद्री मील या लगभग 370 किमी तक जितने भी संसाधन होते है उनका उपयोग देश कर सकता है।  इसे अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) कहा जाता है। इसमें  मछली पकड़ना, खनन और ऊर्जा उत्पादन आदि किया जा सकता है। इसके आगे उस देश अधिकार नहीं होता। बल्कि उसे अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र माना जायेगा। 

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समुद्र पर चलती है क्षेत्रीय देशो की दादागिरी। 
ऐसे में कई सवाल उठते हैं जैसे -क्या समुद्र में भी ‘टोल टैक्स’ देना पड़ता है? मैरीटाइम लॉ यानी समुद्र में आवाजाही से जुड़े कानून की इसमें भूमिका क्या होती है? कैनाल से गुजरने पर क्या होता है? युद्धपोत और पनडुब्बी को लेकर नियम क्या अलग होता है? इस पर विशेज्ञों की लग अलग रे है जैसे इसमें कुछ मार्ग प्राकृतिक है तो कुछ मैन मेड। विशेषज्ञों का कहना है कि जो प्राकृतिक पैसेज हैं उन पर सबका अधिकार है। लेकिन इसके बावजूद कई देश है जो लाखों डॉलर का टैक्स वसूलते हैं।

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मिश्रा की स्वेज नहर 
स्वेज नहर पूरी तरह से मिस्र के नियंत्रण में है। यह भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ता है। यहां जहाज के आकार, वजन और प्रकार के आधार पर लाखों डॉलर का टोल वसूला जाता है। यहाँ तक की कचरा प्रबंधन के नाम पर एक और टैक्स जोड़ा गया है। 

पनामा नहर 
अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाली यह नहर पनामा सरकार के लिए आय का मुख्य स्रोत है। यहां 'स्लॉट नीलामी' और ट्रांजिट फीस के रूप में भारी वसूली होती है। 

तुर्की स्ट्रेट्स- बोस्फोरस और डार्डानेल्स 
उत्तर-पश्चिमी तुर्की में स्थित दो जलमार्ग हैं 'बोस्फोरस' और 'डार्डानेल्स' जो काला सागर को मरमारा और एजियन साग से जोड़ते हैं। हालांकि ये प्राकृतिक रास्ते हैं, लेकिन 1936 की मॉन्ट्रो कन्वेंशन के तहत तुर्की को यहां से गुजरने वाले जहाजों से सैनिटरी निरीक्षण, लाइटहाउस और बचाव सेवाओं के नाम पर शुल्क लेने का अधिकार है। हाल ही में तुर्की ने इसमें कई गुना की बढ़ोतरी की है। 

कोरिंथ नहर से ग्रीस
यह एक छोटी नहर है जहां से गुजरने के लिए ग्रीस टोल वसूलता है। 

 

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 होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर विवाद क्यों ?
अब यहां एक बड़ा साल उठता है कि सबकी अपनी-अपनी समुद्री सीमाएं है तो ईरान का होर्मुज पर अधिकार क्यों नहीं। इस पर पहले समुद्री सीमा पर बने कानूनों को ठीक से समझते है। पहले होर्मुज के आकार के बारे में जान लेते हैं। ये लगभग 167 किलोमीटर यानि लगभग 104 मील लंबा है। इसकी चौड़ाई अलग अलग क्षेत्रो में अलग है। इसके सबसे संकरे बिंदु लगभग 33 से 39 किलोमीटर या 21-24 समुद्री मील चौड़ी है। अब बात इस पर विवाद की। 

समुद्र का कानून और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून दोनों सुनने में भले ही एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनमें एक बड़ा अंतर है. समुद्री कानून निजी व्यापार और जहाजों से जुड़ा है, जबकि लॉ ऑफ द सी, देशों के बीच के रिश्तों और सीमाओं को तय करता है।बात करें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की, जहां जहाजों की पासिंग को लेकर दुनिया में बवाल मचा हुआ है। गौरतलब है कि यहां कोई आधिकारिक ‘टोल गेट’ नहीं है, लेकिन यहां की राजनीति और सुरक्षा स्थिति इतनी संवेदनशील है कि जहाजों को सुरक्षा और बीमा पर बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है। दूसरा हरमुज पर अकेले ईरान का अधिकार नहीं है। इसके उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान का मुसंडम प्रायद्वीप की सीमाएं मुख्य रूप से जुड़ी हैं। यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसके पास ही संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सीमा भी स्थित है, जो इस क्षेत्र का एक प्रमुख खिलाड़ी है। बस यही ईरान अपना दबदबा बनाना चाहता है। उसने हाल में यहाँ से टोल वसूने की घोषणा की। 

अमेरिका-ईरान विवाद  7होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिका और ईरान के बीच विवाद का मुख्य कारण सामरिक और आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जिससे दुनिया का 20% तेल गुजरता है। अमेरिका ने ईरानी तेल निर्यात को रोकने और आर्थिक प्रतिबंधों को कड़ा करने के लिए यहाँ नाकाबंदी की है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।  ईरान इस रास्ते को एक ‘रणनीतिक हथियार’ की तरह इस्तेमाल करता है, जिससे वह वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित करने की ताकत रखता है। हाल ही में ईरान ने यहाँ टैक्स बड़े टैक्स वसूली की बात कही जिससे जिससे अमेरिका समेत कई बड़े देश इसका विरोध कर रहे हैं। 

हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच मचे घमासान ने इस समुद्री मार्ग को युद्ध के मैदान में बदल दिया है। परमाणु विवाद से शुरू हुई यह जंग अब समुद्री सीमाओं पर कब्जे और टोल टैक्स की वसूली तक जा पहुंची है, जिससे वैश्विक व्यापार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य और कूटनीतिक तनातनी में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरा है। 4 मार्च के बाद से इस जलमार्ग को बंद करने की धमकियों ने वैश्विक बाजार में हलचल पैदा कर दी। ईरान ने न केवल इस मार्ग को ब्लॉक करने की कोशिश की, बल्कि अब यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलने का दावा भी ठोक दिया है। 

 

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अमेरिकी नाकेबंदी से बढ़ा विवाद।

अमेरिका की ओर से की गई जवाबी नाकाबंदी ने इस विवाद को और हवा दे दी है, जिससे परमाणु मुद्दे से शुरू हुई लड़ाई अब समुद्री वर्चस्व की होड़ में बदल गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज महज एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की लाइफलाइन है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो भारत समेत पूरी दुनिया में ऊर्जा का संकट खड़ा हो जाएगा। ईरान इसी बात का फायदा उठाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है, ताकि वह अमेरिका के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत कर सके।

अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, किसी भी देश का अपनी तटरेखा से केवल 12 समुद्री मील (लगभग 22 किलोमीटर) तक ही समुद्र पर अधिकार होता है. ईरान इसी 'टेरिटोरियल वॉटर'

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 कानून का हवाला देकर होर्मुज पर अपना मालिकाना हक जताता है. हालांकि, तकनीकी रूप से यह जलमार्ग इतना संकरा है कि यहां ईरान और ओमान की सीमाएं आपस में मिलती हैं.

इसका साफ मतलब है कि होर्मुज पर किसी एक देश का एकाधिकार नहीं है. जितना हक ईरान का है, उतना ही ओमान और यूएई का भी है. ईरान द्वारा टोल टैक्स की वसूली और जहाजों को रोकना सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है।

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