यूपी हरियाणा के बाद अब पश्चिम बंगाल में मजदूरों की आवाज़ बुलंद।
न्यूनतम मजदूरी, भूमि अधिकार और बुनियादी सुविधाओं की मांग। क्या चुनाव पड़ेगा इसका असर?
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर प्रचार और प्रसार का दौर चल रहा है ऐसे में, उत्तर बंगाल के चाय बागान मजदूरों ने न्यूनतम मजदूरी, भूमि अधिकार (पट्टा) और अनेक बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर आवाज़ उठाई है। ये आवाज़ ऐसे वक्त पर उठाई जा रही जब चुनाव बहुत नज़दीक हैं। तो क्या इसका असर चुनाव परिणाम पर भी पड़ेगा ?

अभी यूपी और हरियाणा के मजदूरों का हंगामा ठीक से शांत भी नहीं हुआ था कि, पश्चिम बंगाल में भी चाय मजदूरों ने अपनी मांगों को रखते हुए आवाज उठाई है। दरअसल, उत्तर बंगाल में बहुत सारे चाय के बागान हैं। जिसमें हज़ारों की संख्या में मजदूर काम करते हैं। इन्ही की मेहनत की बदौलत दुनियाभर में चाय पहुँचती है। लेकिन दुख की बात है कि ये मजदूर आज भी बुनियादी सुविधाओं के जूझ रहे हैं। दिनभर चाय के बागानों में काम करने वाले खुद अच्छी चाय पीने से भी वंचित रहते हैं। कई मजदूर आज भी लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाते हैं। अच्छी स्वस्थ्य सुविधाओं, साफ़ पेयजल और बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा से वंचित हैं।

पीएफ और ग्रेच्युटी में अनियमितता
मजदूरों ने शिकायत की है कि उनके वेतन से भविष्य निधि यानि पीएफ का पैसा काटा जा रहा है, लेकिन उसे जमा नहीं किया जा रहा है। साथ ही, सेवानिवृत्त मजदूरों को ग्रेच्युटी मिलने में भी देरी हो रही है। इसके अलावा दार्जिलिंग और डुआर्स क्षेत्र में कई बागानों के बंद होने से हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं, जिससे वे भुखमरी और पलायन को मजबूर हैं।
कम मजदूरी और काम नियमित न मिलना
इन मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या है इन्हे मजदूरी कम मिलती है। ज्यादातर मजदूरों को रोज़ करीब 250 रुपये मिलते हैं, जो उनके लिए पर्याप्त नहीं है। मजदूर चाहते हैं कि उनकी मजदूरी कम से कम 350 रुपये हो जाए ताकि वे अपने परिवार का सही से पालन पोषण कर सकें। दूसरा इन्हे काम भी नियमित नहीं मिलता है। उन्हें कभी काम मिलता है तो कभी नहीं, जिससे उन्हें भविष्य की चिंता बनी रहती है।
स्वास्थ्य और चिकित्सा को लेकर परशानी
अक्सर बीमार होने पर मजदूरों के पास अच्छे अस्पताल और इलाज की सुविधा भी कम है। इसके लिए वे अक्सर चाय बागान के छोटे डॉक्टर या सरकारी अस्पताल पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसे में सही समय पर सही इलाज न मिल पाने के कारण कई बार गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
महिलाओं की सरकार से मांग
चाय बागानों में काम करने वालो मजदूर में 70 से 80 प्रतिशत तक महिलाएं होती है। दिनभर मेहनत करने के बाद भी ये उतना नहीं कमा पाती कि अपनी ज़रूरतों को ठीक से पूरा कर सकें। इसलिए ज़्यादातर महिलाएं चाहती हैं कि उन्हें सिर्फ पैसे ही नहीं, बल्कि सिलाई मशीन या कोई और काम भी दिया जाए ताकी वे अपनी जरूरतों को ठीक से पूरा करे सकें।

सरकारी योजनाओं का मिले लाभ
राज्य में मजदूरों के लिए अनेक सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसी के तहत लक्ष्मी भंडार का लाभ मिलता है, जिससे उन्हें हर महीने कुछ पैसे मिलते हैं। लेकिन कई महिलाएं मानती हैं कि पैसे से ज्यादा जरूरी रोजगार के अवसर मिलना है। इसलिए उन्हें काम का सही अवसर मिलना चाहिए ताकि, वे अपने जीवन को बेहतर बना सकें।
चुनाव पर पड़ सकता है असर
उत्तर बंगाल की लगभग 20 से 22 सीटों पर चाय बागान मजदूरों का दबदबा है। खासकर जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और दार्जिलिंग में इनकी संख्या ज्यादा है. इसलिए चुनाव के समय सभी राजनीतिक पार्टियां इन मजदूरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती हैं। मजदूरों का वोट जिस पार्टी को मिलेगा, वही पार्टी जीत सकती है। इसलिए इस बार चुनाव में ये मजदूर भी बहुत अहम भूमिका निभाने वाले हैं। उनका फैसला ही तय करेगा कि किसकी सरकार बनेगी।

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