पहले कच्चे तेल ने रुलाया, अब खाद्य तेल से निकलेगा उपभोक्ता का 'तेल' !

मंडियों में सरसों की कीमतों में जबरदस्त उछाल, 11,000 रुपये प्रति क्विंटल पार पहुंचेगी कीमत !

Desh Rojana
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ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला गंभीर रूप से बाधित हुई है, जिससे क्रूड आयल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई हैं। कच्चे तेल के साथ-साथ इसका असर खाद्य तेलों व दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर साफ़ देखा जा रहा है। 

Thumbईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच युद्ध का असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है। एक तरफ क्रूड आयल की कीमते आसमान छू रही हैं तो, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति प्रभावित होने से भारत में खाद्य तेल महंगे हो गए हैं। विदेशों से पाम और सोयाबीन तेल का आयात घटने से सरसों की मांग में भारी उछाल आया है। जहाँ 2024-25 में सरसों की अधिकतम कीमत मंडी में 5700 रुपए प्रति क़्वींटल हुआ करती थी। आज ये 11,000 रुपए प्रति क्विंटल के पार पहुँच रही है। सरसों की कीमत में 600-800 रुपये प्रति क्विंटल तक का उछाल आया है। 

किसानों और व्यापारियों के लिए सुनहरा मौका
राजस्थान, जो देश का सबसे बड़ा सरसों उत्पादक राज्य है, वो इसकी बढ़ती कीमतों का सबसे ज़्यादा फायदा उठा रहा है। देश के कुल उत्पादन का 50 फीसदी राजस्थान से आता है। अलवर, भरतपुर, झुंझुनू, सीकर, करौली और दौसा जैसे जिले सरसों उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। अलवर की मंडियों में इस समय भारी गहमा-गहमी देखि जा रही है। जहां पहले मजदूरों को काम नहीं मिल रहा था, वहीं अब पल्लेदार दिन-रात काम कर रहे हैं। सरसों की बढ़ती कीमतों से किसानों और व्यापारियों दोनों को अच्छा मुनाफा मिल रहा है।

 बता दें कि सरकार की ओर से 2026–27 के लिए सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6200 रुपए निर्धारित किया गया है। जबकि बाजार भाव इससे बहुत ऊपर चल रहे हैं। ऐसे में किसानों को बाजार में सरसों बेचने से अच्छा मुनाफा हो रहा है।

क्या कहता है FAO ?
फ़ूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (FAO) ने भी स्वीकार किया है कि अंतराष्ट्रीय तनाव के चलते खाद्य तेलों सहित दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतें सितंबर 2025 के बाद से उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है। 

आयात में गिरावट से बदले समीकरण
व्यापारियों का कहना है कि, भारत में पाम ऑयल मुख्य रूप से मलेशिया से और सोयाबीन तेल अमेरिका से आयात किया जाता है। लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात और डॉलर की बढ़ती कीमत के कारण आयात महंगा और सीमित हो गया है। पिछले साल जहां देश में करीब 117 लाख टन सरसों का उत्पादन हुआ था, वहीं इस साल ये घटकर करीब 111 लाख टन रह सकता है। हालांकि, उनका ये भी कहना कि सरसों की बढ़ी कीमत इसकी भरपाई कर सकती है। 

क्या कहते हैं विशेषज्ञ ?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहा तनाव लम्बे समय तक जारी रह सकता है तो, सरसों और सरसों तेल के दाम में और बढ़ोतरी हो सकती है। पहले अकसर विदेशी तेल की वजह से देश में सरसों का स्टॉक वर्षभर बना रहता था, इस बार ये लगभग खत्म होने के कगार पर है। इसलिए सरसों की बढ़ती कीमतों का असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है, क्योंकि खाद्य तेल महंगा होगा तो इससे घरेलू बजट पर दबाव बढ़ेगा। अलवर, जो सरसों तेल उत्पादन का बड़ा केंद्र माना जाता है, यहां से तैयार तेल की सबसे ज्यादा सप्लाई बंगाल, असम और बिहार जैसे राज्यों में होती है। यही वजह है कि यहां की मंडियों में हलचल तेज बनी हुई है।

विशषज्ञों की किसानों को सलाह।
मंडी प्रतिदिन सरसों के भाव में बड़े उतार-चढाव देखने को मिल रहे हैं। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे अपनी सरसों की फसल बेचने से पहले अपनी निकटतम मंडी से भावों की जानकारी अवश्य लें और उसके बाद ही अपनी सरसों की फसल को बेचने जाएं।  

बेहतर क्वालिटी की सरसों से तेल की मात्रा 
1 लीटर सरसों का तेल निकालने के लिए आमतौर पर ढाई से 3 किलो (2.5 - 3 kg) अच्छी क्वालिटी की सूखी सरसों की आवश्यकता होती है। सरसों की गुणवत्ता के आधार पर, यह मात्रा थोड़ी कम या ज्यादा हो सकती है, लेकिन सामान्यतः 100 किलो सरसों से लगभग 35-40 लीटर तेल निकलता है। 

उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा असर 
सरसों के मंडी में भाव जब 5000 से 6000 रुपए प्रति कुंतल थे तब बाजार में सरसों के तेल की कीमत 120 से 160 रुपए प्रति लीटर थी। अब सरसों की बढ़ती कीमत से उपक्ता को चिंता सत्ता रही है कि खाद्य तेलों के दाम उसकी जेब पर भारी पड़ने वाले हैं। हालाँकि सरकार की कोशिश है कि आमजन को इससे परेशानी ना उठानी पड़े। 

 

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