Gurugram News: एचएसवीपी के रद्द प्लॉट को कागजों में जिंदा कर करोड़ों का खेल!

एचएसवीपी के पूर्व मुख्य प्रशासक समेत नौ पर एफआईआर, 1.75 करोड़ के कलेक्टर रेट वाले प्लॉट की 6.71 लाख में दिखाई कन्वेयंस डीड

Desh Rojana
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हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) में करोड़ों रुपये कीमत के एक प्लॉट के कथित अवैध हस्तांतरण का मामला सामने आया है।

गुरुग्राम: हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) में करोड़ों रुपये कीमत के एक प्लॉट के कथित अवैध हस्तांतरण का मामला सामने आया है। हरियाणा राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार-रोधी ब्यूरो (एसीबी) की करीब सात साल चली जांच के बाद गुरुग्राम पुलिस स्टेशन में एचएसवीपी के तत्कालीन मुख्य प्रशासक समेत नौ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। जांच में आरोप है कि करीब 30 साल पुराने प्लॉट आवंटन मामले में रिकॉर्ड और सरकारी प्रक्रिया का कथित तौर पर इस्तेमाल कर रद्द किए जा चुके प्लॉट को दोबारा वैध कराने का रास्ता बनाया गया, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा।
 
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नामजद आरोपियों में तत्कालीन मुख्य प्रशासक डॉ. सुरेश कुमार, पूर्व संपदा अधिकारी मुकेश कुमार, सहायक कृष्ण कुमार, क्लर्क हनुमान सिंह के अलावा कारोबारी एसके खोसला, सतवीर सिंह मलिक, अभय सहारन, राम निवास राठी और वशिष्ठ कुमार गोयल शामिल हैं। आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120बी, 409 और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
 
2002 में रद्द हो चुका था प्लॉट, फिर कैसे हुआ हस्तांतरण?
सूत्रों के अनुसार, मामला सेक्टर-23/23ए स्थित प्लॉट नंबर 4377 से जुड़ा है। करीब 500.64 वर्ग गज के इस प्लॉट को वर्ष 1988 में एसके खोसला की एक फर्म को 6.74 लाख रुपये में आवंटित किया गया था। आवंटन के समय केवल 10 फीसदी राशि जमा की गई थी। बकाया राशि जमा नहीं कराने पर एचएसवीपी ने बार-बार नोटिस जारी किए, लेकिन भुगतान नहीं हुआ।
 
इसके बाद 8 अप्रैल 2002 को एचएसवीपी ने प्लॉट का आवंटन रद्द कर उसे वापस ले लिया। यहीं से इस मामले में सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जिस संपत्ति का आवंटन वर्षों पहले रद्द हो चुका था, वह बाद की प्रक्रिया में दोबारा किस तरह सामने आई?
 
जांच के मुताबिक, खोसला ने वर्ष 2003 में इस जब्त प्लॉट के संबंध में अभय सहारन के नाम जीपीए तैयार कराई। इसमें राम निवास राठी गवाह बने। बाद में संपत्ति सतवीर सिंह मलिक को हस्तांतरित कर दी गई।
 
दूसरे प्लॉट की कहानी को बनाया आधार
एसीबी जांच के अनुसार, खोसला के ही एक अन्य प्लॉट नंबर 4358 की पूरी राशि समय पर जमा हो चुकी थी, लेकिन रिकॉर्ड में गड़बड़ी के कारण उसका आवंटन भी रद्द कर दिया गया था। बाद में उपभोक्ता फोरम के आदेश पर इस प्लॉट को बहाल किया गया।
 
जांच एजेंसी का आरोप है कि अधिकारियों ने प्लॉट नंबर 4377 और 4358 के दोनों मामलों को एक जैसा दर्शाया, जबकि दोनों की वास्तविक परिस्थितियां अलग थीं। प्लॉट नंबर 4377 बकाया राशि जमा नहीं कराने के कारण रद्द हुआ था, जबकि दूसरे प्लॉट के मामले में रिकॉर्ड संबंधी गड़बड़ी सामने आई थी।
 
जांच में आरोप है कि क्लर्क हनुमान सिंह और सहायक कृष्ण कुमार ने इसी आधार पर गलत नोट तैयार किया। इसे तत्कालीन संपदा अधिकारी मुकेश कुमार ने मंजूरी देकर आगे बढ़ाया।
 
3.5 करोड़ की संपत्ति, कागजों में महज 6.71 लाख!
मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू प्लॉट की कीमत को लेकर सामने आया है। जांच के मुताबिक, वर्ष 2019 में इस प्लॉट की कलेक्टर रेट के आधार पर कीमत करीब 1.75 करोड़ रुपये थी, जबकि इसका वास्तविक बाजार मूल्य करीब 3.5 करोड़ रुपये आंका गया।
 
इसके बावजूद इसकी कन्वेयंस डीड में कीमत महज 6.71 लाख रुपये दिखाई गई। यानी जिस संपत्ति की सरकारी दर से कीमत ही करोड़ों में थी, उसकी दस्तावेजी कीमत कई गुना कम दिखाई गई। इससे सरकारी राजस्व को हुए संभावित नुकसान को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
 
मुख्य प्रशासक के आदेश पर बहाली का रास्ता खुला
जांच के अनुसार, अधिकारियों द्वारा दोनों मामलों को समान मानते हुए तैयार की गई प्रक्रिया अंततः तत्कालीन मुख्य प्रशासक डॉ. सुरेश कुमार तक पहुंची। आरोप है कि 1 मार्च 2019 को उन्होंने दोनों मामलों को एक समान मानते हुए रद्द प्लॉट की जब्ती को निरस्त कर दिया।
 
यहीं से जांच एजेंसी की भूमिका और सरकारी अधिकारियों के निर्णय सवालों के घेरे में हैं—क्या रिकॉर्ड में मौजूद अंतर जानबूझकर नजरअंदाज किया गया? क्या रद्द हो चुके प्लॉट को बहाल कराने के लिए दूसरे मामले का सहारा लिया गया? और करोड़ों की संपत्ति की कीमत महज लाखों में कैसे पहुंच गई?
 
सात साल की जांच के बाद एफआईआर
यह मामला सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी सतेंद्र कुमार द्वारा एसपी की निगरानी में की गई विस्तृत विजिलेंस जांच से सामने आया। जांच के बाद दी गई सिफारिशों और फरवरी 2026 में हरियाणा के मुख्य सचिव से मुकदमा चलाने की मंजूरी मिलने के बाद अगस्त 2026 में एसीबी थाने में एफआईआर दर्ज की गई।
 
अब मामले की विस्तृत जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी को सौंपी गई है। जांच एजेंसी के मुताबिक, जांच के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी। इससे इस मामले में अन्य अधिकारियों और कथित बिचौलियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की संभावना है।
 
बड़े सवाल, जिनका जवाब जांच में तलाशा जाएगा
- 2002 में रद्द हो चुका प्लॉट 2019 में दोबारा वैध कैसे हुआ?
- प्लॉट 4377 और 4358 को एक जैसा दिखाने की जरूरत क्यों पड़ी?
- करोड़ों की संपत्ति की कन्वेयंस डीड महज 6.71 लाख रुपये में कैसे हुई?
- सरकारी राजस्व को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
- इस पूरी प्रक्रिया में और कितने अधिकारी या बिचौलिए शामिल थे?
 
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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्‍स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।

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