हिमालयी पारिस्थितिकी: राष्ट्रीय संगोष्ठी में विज्ञान,नीति एवं परंपरा के समन्वय पर बल

Desh Rojana
On

दीन दयाल उपाध्याय महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा “हिमालयी पारिस्थितिकी: वर्तमान चुनौतियाँ एवं भविष्य की संभावनाएँ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ।

नई दिल्ली: दीन दयाल उपाध्याय महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा “हिमालयी पारिस्थितिकी: वर्तमान चुनौतियाँ एवं भविष्य की संभावनाएँ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। यह संगोष्ठी पर्यावरण संरक्षण गतिविधि (दिल्ली प्रांत) तथा एआरपीए ऑपर्च्युनिटी फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित की गई। यह संगोष्ठी एक उच्चस्तरीय बहुविषयक मंच के रूप में स्थापित हुई, जिसमें देशभर के शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों ने हिमालयी क्षेत्र के समक्ष उपस्थित जटिल पारिस्थितिक चुनौतियों पर गहन विमर्श किया तथा सतत संरक्षण हेतु समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया।
1001522001
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात विद्वान, पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, पूर्व भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष एवं पद्म विभूषण से सम्मानित मुरली मनोहर जोशी ने अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने अपने उद्बोधन में “हिमालय है तो हम हैं” के गहन भाव को विस्तार देते हुए हिमालय और भारतीय सभ्यता के अभिन्न संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं पारिस्थितिक पहचान का मूल आधार है।
वर्तमान में अनियोजित विकास, असंतुलित शहरीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न संकटों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण हेतु त्वरित एवं सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया। तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जमीनी अनुभवों का समन्वय देखने को मिला। प्रोफेसर दीनबंधु साहू, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने अंटार्कटिका में अपने अनुसंधान अनुभवों को साझा करते हुए हिमालय को “पृथ्वी का तृतीय ध्रुव” बताया तथा जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इसकी संवेदनशीलता को स्पष्ट किया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थापित “कार्बन कैप्चर उद्यान” की अवधारणा को जलवायु परिवर्तन शमन के एक प्रभावी मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रोफेसर पी. के. जोशी ने भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) एवं दूरसंवेदी प्रौद्योगिकी (रिमोट सेंसिंग) जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से हिमालयी पारिस्थितिकी के अध्ययन, निगरानी एवं प्रबंधन की संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
वहीं प्रोफेसर बिन्ध्यवासिनी पांडेय (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने वैश्विक जलवायु परिवर्तन, एल-नीनो प्रभाव तथा ब्लैक कार्बन उत्सर्जन के हिमालयी हिमनदों एवं पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी के दौरान “स्थानीय स्तर पर आधारित संरक्षण” की अवधारणा विशेष रूप से उभरकर सामने आई। प्रोफेसर वी. एस. नेगी (DU) एवं डॉ. संजीव शर्मा (JNU) ने इस बात पर बल दिया कि हिमालयी संरक्षण के लिए पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान (टी.ई.के.) एवं स्थानीय समुदायों के अनुभवों का समुचित समावेश अनिवार्य है। नीतिगत दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए डॉ. अच्युतानंद शुक्ला (पर्यावरण मंत्रालय) ने भारत सरकार द्वारा हिमालयी संरक्षण हेतु अपनाई जा रही वर्तमान पहलों एवं नीतिगत दिशाओं की जानकारी दी तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया।
संगोष्ठी में पारिस्थितिक जोखिमों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। पंजाब विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डेज़ी आर. बातिश ने हिमालयी क्षेत्रों में आक्रामक विदेशी वनस्पतियों के बढ़ते प्रभाव को गंभीर चुनौती बताया, जबकि भारतीय वन अनुसन्धान परिषद (ICFRE) के प्रोफेसर राजीव पांडेय ने जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अनुकूलन एवं शमन रणनीतियों के अंतर्गत सतत वन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया।
यह संगोष्ठी महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर हेम चंद जैन के संरक्षण में आयोजित हुई, जिसमें संयोजक प्रोफेसर राजकुमारी सनायमा देवी, आयोजन सचिव डॉ. सच्चिदानंद त्रिपाठी तथा कोषाध्यक्ष डॉ. संदीप कुमार के नेतृत्व में आयोजन समिति के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देशभर से आए शोधार्थियों, स्नातकोत्तर एवं स्नातक विद्यार्थियों ने भी अपने शोध कार्यों के माध्यम से सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की। 
संगोष्ठी के समापन पर आयोजन समिति ने विशेषज्ञों के सुझावों एवं विमर्शों के आधार पर ठोस एवं क्रियान्वयन योग्य अनुशंसाओं का संकलन करने तथा उन्हें संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों को प्रेषित करने का निर्णय लिया, ताकि हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण हेतु प्रभावी नीतिगत कदम उठाए जा सकें। यह संगोष्ठी इस स्पष्ट संदेश के साथ संपन्न हुई कि हिमालय की दीर्घकालिक सुरक्षा एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान, नीति एवं पारंपरिक ज्ञान के समन्वित प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं।
Desh Rojana Hiring Ad

About The Author

संबंधित समाचार

Desh Rojana Hiring Ad