पश्चिम बंगाल- साधन संपन्न और खुशहाल प्रदेश कैसे बना पिछड़ेपन का शिकार ?
देश की आर्थिक राजधानी से भुखमरी और गरीबी तक का सफर, पश्चिम बंगाल।
कभी देश आर्थिक राजधानी हुआ करता था पश्चिम बंगाल। प्राकृतिक रूप से साधन संपन्न और बहुत ही खुशहाल प्रदेश, आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। इतने खुशहाल प्रदेश को अर्श से फर्श पर लाने में कौन से कारण जिम्मेदार हैं ? चलिए आज इसी का विश्लेषण करते हैं।

पश्चिम बंगाल में इलेक्शन नजदीक हैं। चारों और चुनावी भाषण और रैलियों का दौर चल रहा है। ऐसे में बंगाल की कमजोर कड़ी की सब बखिया उधेड़ रहे हैं। यहां की गरीबी, रोजगार की कमी, हिन्दू मुस्लिम विवाद, दंगे और पलायन करते लोग। कहने का मतलब है कि बंगाल गरीबी, भुखमरी और अनेक परशानियों से जूझ रहा है। प्रदेश में अशांति का माहौल है।
अब सवाल ये उठता है कि, क्या बंगाल शुरू ऐसा ही था ? जवाब है नहीं, क्योकि पश्चिम बंगाल प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। जैसे-उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, विस्तृत वन क्षेत्र (सुंदरबन), गंगा-भागीरथी नदी प्रणाली, और प्रचुर मात्रा में कोयला भंडार से समृद्ध है। राज्य में चावल, जूट, चाय और आलू की प्रमुख खेती होती है। प्रमुख खनिजों में कोयला, देश का करीब आधा हिस्सा यही से आता है, अग्नि-मिट्टी यानि सिरेमिक और चीनी मिट्टी शामिल हैं। ये सभी संसाधन किसी भी क्षेत्र को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन आज बंगाल की हालत बद से बदतर हो गई है।
मुग़ल काल से लेकर अंग्रेजी सियासत तक पूरे देश पर यही से अर्तव्यवस्था का संचालन होता था। क्योंकि ये देश की आर्थिक राजधानी हुआ करती थी। इस दौर में बंगाल भारत का सबसे

संपन्न हिस्सा हुआ करता था। अब एक बड़ा सवाल कि, अगर इतना संपन्न राज्य था बंगाल तो आज यहाँ के लोग देश भर में रोजगार की तलाश में मारे-मारे क्यों फिर रहे हैं। इसकी बदहाली का कारण क्या ? आखिर ऐसा क्या हुआ कि 'भारत की आर्थिक राजधानी' कहलाने वाला यह प्रांत धीरे-धीरे पीछे छूटता गया? तो चलिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं और जानते है कि बंगाल दशा और दिशा बिगाड़ने में कौन से कारण जिम्मेदार है। ।
दरअसल इसके पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि घटनाओं का एक ऐसा सिलसिला है, जिसने बंगाल की भूगोल और तकदीर दोनों बदल दी। 20वीं सदी की शुरुआत तक कलकत्ता जिसे अब कोलकाता के नाम से जाना जाता है ये न केवल बंगाल की, बल्कि पूरे भारत की राजधानी हुआ करती थी। साल 1911 में अंग्रेजो ने कोलकाता को छोड़ देश की राजधानी दिल्ली को बनाया। यह सिर्फ दफ्तरों का एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट होना नहीं था। इसने बंगाल की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया। किसी देश की राजधानी होना और फिर महज एक राज्य की राजधानी बनकर रह जाना, बहुत बड़ा अंतर पैदा करता है। इस बदलाव से निवेश, सत्ता का केंद्र और अंतरराष्ट्रीय महत्व दिल्ली की ओर झुक गया। यह बंगाल के आर्थिक स्थिति को तोड़ने जैसा था।

बंगाल के पतन की सबसे बड़ी वजह बना 1947 का बंटवारा। बंगाल दो हिस्सों में बंट गया। जिसका पश्चमी हिस्सा भारत के पास रहा जिसे आज पश्चिम बंगाल के नाम से जाना जाता है जबकि पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया जो 1971 में बांग्ला देश बना। ये सिर्फ एक बंटवारा नहीं था बल्कि बंगाल के माथे पर खींची गई बदकिस्मती की एक स्याह लकीर थी। एक खुशहाल और संपन्न अर्थव्यवस्था का कत्ल था।
बंगाल जूट का सबसे बड़ा केंद्र था। इस बंटवारे ने उसे बर्बाद कर दिया। जूट पैदा करने वाले खेत पूर्वी हिस्से में चले गए, जबकि उसे प्रोसेस करने वाली मिलें हुगली नदी के किनारे पश्चिम बंगाल में रह गईं। कच्चा माल कहीं और, कारखाना कहीं। इस विसंगति ने बंगाल के औद्योगिक ढांचे को तोड़ दिया। बंटवारे के बाद मानवीय त्रासदी का ये वो दंश था जिसे बंगाल आज भी झेल रहा है।

पूर्वी पाकिस्तान बनने से लाखों की संख्या में लोग अपनी जमीन, जायदाद और पुश्तैनी काम छोड़कर इस तरफ आए यानि पश्चिम बंगाल में आ गए। एक बसा-बसाया परिवार जब शरणार्थी बनकर आता है, तो उसे दोबारा शून्य से शुरू करना पड़ता है। जिसमे उसकी कई पीढ़ियां लग जाती हैं बंगाल की सीमित ज़मीन और संसाधनों पर अचानक आबादी का भारी बोझ बढ़ गया। जब रोटी का संकट सामने हो, तो समाज की बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रगति रुक जाती है। ऐसा ही कुछ यहाँ भी हुआ।
अभी लोग बंगाल बंटवारे के घावों से उबर भी नहीं पाए थे कि उन्हें एक और बड़ा झटका लगा। 1971 की उथल-पुथल शुरू हो गई। पाकिस्तान और पूर्वी पाकिसतन अलग हो गए। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान एक बार फिर शरणार्थियों का भारी रेला पश्चिम बंगाल की सीमाओं में दाखिल हुआ। कम क्षेत्रफल में घनी आबादी का दबाव बढ़ने से बंगाल के प्राकृतिक संसाधनों पर जो हक यहाँ के पुराने बाशिंदों का था, उसे अब करोड़ों नए लोगों के साथ साझा करना पड़ा। जो इसे और गर्त में ले गया। बढ़ती आबादी और खाने के लाले पड़ने लगे तो पढ़े-लिखे लोग दूसरे राज्यों की और चले गए और पीछे छूट गए अनस्किलड लोग जिससे बंगाल और बिखर गया।

आप बंगाल का नक्शा देखेंगे तो पाएंगे की ये एक पतला और लम्बा दर्रे जैसा दिखने वाला है। इसकी भौगोलिक सीमाएँ 4000 किमी से ज्यादा है जो इतनी पेचीदा हैं कि कई जगह डिफाइन करना भी मुश्किल कि कहाँ भारतीय सीमा रेखा है और कहाँ बांग्लादेश। भारत-बांग्लादेश सीमा पर '150 गज' का क्षेत्र है जहाँ अंतरराष्ट्रीय नियम लागू है, उस सीमावर्ती इलाकों में एक ऐसी आबादी रहती है जो न इधर की है और ना ही उधर की।
इसके अलावा रोजगार की तलाश में नेपाल और भूटान से लोग पश्चिम बंगाल चले आते हैं। बांग्लादेशी और म्यांमार से रोहिंग्या भी भारत में बसने की चाह लेकर अक्सर यहाँ घुसपैठ करते रहते हैं। विशेषज्ञ बताते है कि इन देशों से अंतरराष्ट्रीय प्रवासन का भार पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों पर पड़ता है। आज भी तिब्बत से लेकर बांग्लादेश तक की सीमाओं से घिरा यह राज्य हमेशा से एक संवेदनशील 'बफर ज़ोन' बना रहा, जिसका असर इसके स्थिर आर्थिक विकास पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि वाम मोर्चा यानि लेफ्ट फ्रंट का लंबा शासन और 'उद्यम-विरोधी' नीतियां भी इसका बड़ा कारण रही हैं। क्योंकि वामपंथी सरकार पूंजीवाद, लाइसेंस राज और उद्योगों के प्रति कड़े रवैया रखती थी। वामपंथी शासन के दौरान ट्रेड यूनियनों की भूमिका बहुत आक्रामक थी। बार-बार होने वाली हड़तालें, तालाबंदी और काम न करने की संस्कृति के कारण उद्योगों को भारी नुकसान हुआ। जिससे कई उद्योगपति बंगाल छोड़कर गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चले गए।

1952 में फ्रेट इक्वलाइजेशन नीति लागू की गई जिससे खनिज संपन्न प्रदेश होने के बाद भी बंगाल इसका लाभ नहीं ले पाया। क्योंकि पूरे देश में कोयला, लौह अयस्क समान मूल्य पर उपलब्ध कराया गया, जिससे बंगाल का जो भौगोलिक लाभ था, वह समाप्त हो गया। इसके अलावा नक्सलवाद ने भी बंगाल को पीछे धकेलने का काम किया।
दिल्ली में बैठकर बनाई गई नीतियां अक्सर बंगाल की इन जमीनी हकीकतों ठीक से समझ नहीं पाई। बंगाल का पीछे छूटना सिर्फ गलत नीतियों का नतीजा नहीं था, बल्कि इतिहास की क्रूर मारों का परिणाम भी है। आप ही सोचिये जिन्होंने बार-बार विस्थापन को झेला, सीमावर्ती और राजनितिक उठा-पटक ने बंगाल को खूब पटक पटक कर धोया। अनिश्चितता का दौर देखा। उसके लिए अपने अस्तित्व को बचाना दूर की कौड़ी बन गई थी। उसे वापस पाना बहुत कठिन है यहाँ पहचान और अस्तित्व की लड़ाई आज भी जारी है।

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