कांग्रेस ने थोड़ी सी चूक किए कराए पर फेर सकती है पानी: संजय मग्गू

संजय मग्गू
कांग्रेस ने अब रणनीति बनाकर उस पर अमल करना सीख लिया है। वैसे तो जंतर-मंतर पर चल रहा धरना-प्रदर्शन खत्म हो गया है। सारे युवा अपने-अपने घर पहुंच चुके हैं, लेकिन कांग्रेस ने पेपरलीक और छात्रों के मुद्दे को खत्म नहीं माना है। यही वजह है कि वह अब युवाओं की लड़ाई संसद में लड़ रही है। पैलेट गन के मुद्दे को लेकर कांग्रेस संसद में अड़ी हुई है और सीधे गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांग रही है। इससे कांग्रेस देश के युवाओं को यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह युवाओं के साथ है। वह उनकी लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ रही है। अब सवाल यह है कि कांग्रेस यह लड़ाई कब तक लड़ेगी?
यदि कांग्रेस संसद सत्र तक ही युवाओं के मुद्दे को जिंदा रखती है, तो उसका लाभ कांग्रेस को बहुत सीमित मिल सकता है। लेकिन अगर वह संसद सत्र खत्म होने के बाद शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर लेती है और इन मुद्दों को लेकर सड़क पर उतर जाती है, तो निश्चित रूप से कांग्रेस को फायदा होने वाला है। यह बात तो सभी जानते हैं कि देश के युवा जिस दल के समर्थन में होंगे, उस दल को सरकार बनाने कोई परेशानी नहीं होगी। पेपरलीक का मुद्दा सामने आने के बाद ही कांग्रेस ने अपने से युवाओं को जोड़ने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की शुरुआत की।
राहुल गांधी ने इस काम में बैकडोर से एनएसयूआई को लगाया। कोटा और देहरादून में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को मंच से दूर रखकर केवल युवाओं की बात की। उनके ही मुद्दे उठाए। इसी बीच सीजेपी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। कांग्रेस ने सीजेपी के मंच पर जाने से परहेज किया। वह नहीं चाहती थी कि छात्रों के आंदोलन को किसी सियासी दल का मुखौटा कहकर भाजपा को घेरने का मौका किया जाए। यदि सीजेपी के आंदोलन से शुरुआती दिनों में कांग्रेस जुड़ जाती तो छात्राओं का आंदोलन इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता और अन्य आंदोलनों की तरह फुसफुसा जाता।
संसद मार्च के दौरान जैसे ही युवाओं पर लाठीचार्ज, पैलेट गन और आंसूगैस के गोले के इस्तेमाल की खबर आई, कांग्रेस अपने सांसदों के साथ पीएम हाउस घेरने निकल पड़ी। बस, यही वह टर्निंग प्वाइंट था जिसने कांग्रेस को युवाओं के मुद्दे पर फ्रंट में ला दिया।
कांग्रेस को यह समझ में आ गया कि जितना जरूरी सड़क पर लड़ना है, उतना ही महत्वपूर्ण युवाओं के मुद्दे पर संसद में लड़ते हुए दिखना है। सो, कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में पिछले कुछ दिनों से संसद में युवाओं के मुद्दे पर लड़ती हुई दिखाई दे रही है। अब यह कांग्रेस पर निर्भर करता है कि वह ‘छात्रों की गूंज’ को आगे बढ़ाते हैं या फिर ‘इति कर्तव्यम’ मानकर यहीं छोड़ देते हैं। यदि कांग्रेस इस मुद्दे को यहीं छोड़ देती है, तो बहुत बड़ी गलती करेगी। सभी जानते हैं कि भाजपा पिछले तीन बार लोकसभा चुनाव में युवाओं की ही अंगुली पकड़कर सत्ता में आई है। हालांकि 2024 में भाजपा की पकड़ युवाओं पर थोड़ी ढीली पड़ती थी। अब तो भाजपा के हाथ से युवाओं की बागडोर निकलती हुई दिखाई दे रही है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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