जेन जेड को समझना होगा, रातोंरात नहीं बदलता सिस्टम: संजय मग्गू

संजय मग्गू
मुझे भारत की सबसे प्रसिद्ध फिल्म ‘शोले’ का एक डॉयलाग याद आ रहा है। फिल्म में गब्बर सिंह कहता है कि पचास-पचास कोस की दूर किसी गांव में जब कोई बच्चा रोता है, तो मां कहती है, बेटा चुप हो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा। आज जेन जेड की हालत यही है। वह गब्बर सिंह की तरह सरकार को डरा रहा है, राजनीतिक दलों के दिलों की धड़कन बढ़ा रहा है। आज की तारीख में हालत यह है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें जेन जेड का नाम से कांप रही हैं। अब तो जेन अल्फा भी अपना रंग दिखा रहे हैं। जेन जेड और जेन अल्फा ने पिछले दो महीनों में जो आतंक कायम किया है, उतना आतंक तो गब्बर सिंह का भी रामगढ़ वालों पर नहीं था। मीडिया हो या सोशल मीडिया, जेन जेड के कसीदे काढ़ने में लगा हुआ है। लिखा जा रहा है कि जेन जेड ने जो कमाल कर दिखाया है, वह पिछले बारह सालों में कोई नहीं कर पाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आधी रात को इंस्टाग्राम पर जेन जेड से बात करने को मजबूर हो गए हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भी मजबूर होकर जेन जेड को देशभक्त और सबसे ईमानदार बताना पड़ रहा है, तो इसके पीछे यही डर है कि कहीं जेन जेड फिर न उठकर खड़ा हो जाए। कांग्रेस तो काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से पहले ही जेन जेड को लुभाना शुरू कर दिया था। जब सीजेपी का आंदोलन सफल हुआ, तो हर दल जेन जेड को दुलराने में लग गया।
क्या सत्ताधारी और क्या विपक्ष, सबका एक ही ध्येय बन गया है कि अधिक से अधिक जेन जेड और भावी मतदाता जेन अल्फा को अपने पक्ष में किया जाए। एलओपी राहुल गांधी इस मामले में फिलहाल सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई पड़ रहे हैं। वह सिस्टम में सुधार लाने की बात कहते हुए सरकार से इसकी मांग कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिस्टम बदलना इतना आसान है? राहुल गांधी और जेन जेड के कह देने भर से या केंद्र और राज्य सरकारों के इच्छा मात्र से सिस्टम बदल जाएगा? क्या शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही आ जाएगी। नहीं, यह कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह जेन जेड का धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना जैसा नहीं है।
सिस्टम कोई एक दिन में नहीं बनता है। दशकों लगते हैं, तब कहीं जाकर कोई सिस्टम खड़ा हो पाता है, वह भी देश को संचालित करने जैसा सिस्टम। इसमें सुधार या बदलाव भी करिश्माई अंदाज में रातोंरात नहीं होने वाला है। जेन जेड में जो अधीरता पिछले कुछ दिनों से देखी जा रही है, वह कई बार डराती है। जब कोई आंदोलन हीरोइज्म का शिकार हो जाता है, तो उसमें कई तरह की विसंगतियां पैदा होने लगती हैं। युवाओं का असंतोष, आक्रोश और जवाबदेही की मांग करना जायज है। लेकिन जेन जेड को किसी भय का प्रतीक मत बनाइए। उनके जायज कामों की सराहना कीजिए, लेकिन यदि वह गलत करते हैं, तो उनकी आलोचना करने से भी मत हिचकिए। उन्हें सामान्य युवा रहने दीजिए, रॉबिनहुड मत बनाइए। नहीं तो वह अपने जायज मुद्दों से भटक जाएंगे।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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