Mohali News:केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने चंडीगढ़ स्थित ‘नेशनल एग्री-फूड एंड बायोमैन्युफैक्चरिंग इंस्टीट्यूट’ में पहली तरह के “ग्रीन फोर्ज” कॉम्प्लेक्स का किया उद्घाटन, इसे आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों की क्रांति में मील का पत्थर बताया
स्टार्ट-अप्स, एसएमई और शोधकर्ताओं के सहयोग के लिए 22 मैन्युफैक्चरिंग हब और आठ विशिष्ट बायोफाउंड्री सुविधाएं विकसित की जा रही हैं
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज मोहाली स्थित ‘नेशनल एग्री-फूड एंड बायोमैन्युफैक्चरिंग इंस्टीट्यूट’ (BRIC-NABI) में पहली तरह के “ग्रीन फोर्ज” कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन किया। केंद्रीय मंत्री ने इस सुविधा को आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों की क्रांति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया।
मोहाली: केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज मोहाली स्थित ‘नेशनल एग्री-फूड एंड बायोमैन्युफैक्चरिंग इंस्टीट्यूट’ (BRIC-NABI) में पहली तरह के “ग्रीन फोर्ज” कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन किया। केंद्रीय मंत्री ने इस सुविधा को आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों की क्रांति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया।

BRIC-नेशनल एग्री-फूड एंड बायोमैन्युफैक्चरिंग इंस्टीट्यूट (BRIC-NABI) में आयोजित राष्ट्रीय BioE3 कॉन्क्लेव (Biotechnology for Economy, Environment and Employment) को संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि नव-उद्घाटित ग्रीन फोर्ज सुविधा में उपलब्ध नियंत्रित सिमुलेशन चैंबर विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों की खेती और प्रयोगों को संभव बनाएंगे। इससे शोधकर्ताओं को विभिन्न स्थानों और जलवायु परिस्थितियों में फसलों की उपयुक्तता का आकलन करने में मदद मिलेगी।

सुविधा के महत्व को स्पष्ट करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ग्रीन फोर्ज के सिमुलेशन चैंबर में प्रकाश की मात्रा और गुणवत्ता, आर्द्रता तथा तापमान को आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है, जिससे फसलों के विकास और प्रयोगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस क्षमता के माध्यम से शोधकर्ता यह समझ सकेंगे कि कोई विशेष फसल विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में किस प्रकार प्रदर्शन करती है और उसके आधार पर यह आकलन किया जा सकेगा कि वह किन स्थानों पर खेती के लिए अधिक उपयुक्त हो सकती है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जब किसी नई आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल की किस्म विकसित की जाती है, तो एक महत्वपूर्ण चुनौती यह निर्धारित करना होता है कि उसकी खेती किस स्थान पर सबसे प्रभावी ढंग से की जा सकती है। ग्रीन फोर्ज विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों को नियंत्रित वातावरण में पुनः निर्मित करके इस चुनौती से निपटने में मदद कर सकता है। इससे शोधकर्ता उपयुक्त परिस्थितियों में फसलों की प्रतिक्रिया का अध्ययन कर सकेंगे और उसके बाद उन्हें उपयुक्त खेती वाले क्षेत्रों में ले जाया जा सकेगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ग्रीन फोर्ज में ऐसे विशिष्ट पर्यावरणीय मानकों को पुनः निर्मित करने की क्षमता है, जिन्हें प्राकृतिक परिस्थितियों में दोहराना कई बार कठिन होता है। उन्होंने कहा कि प्रकाश की गुणवत्ता और मात्रा, आर्द्रता तथा तापमान का सिमुलेशन, तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी उन्नत तकनीकों के एकीकरण की संभावना शोधकर्ताओं को प्रयोगों के संचालन में अधिक लचीलापन प्रदान करेगी। उन्होंने ग्रीन फोर्ज को कृषि और चिकित्सा विज्ञान के गंभीर एवं उन्नत अनुसंधान के लिए विशेष महत्व वाली एक अभिनव सुविधा बताया।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ऐसी सुविधाएं जैव प्रौद्योगिकी, उन्नत सिमुलेशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते समन्वय को दर्शाती हैं, जो अनुसंधान और प्रयोगों के लिए नई संभावनाएं खोल रही हैं। उन्होंने कहा कि ग्रीन फोर्ज की क्षमताओं के साथ एआई का एकीकरण अनुसंधान प्रक्रियाओं को अधिक सुगम बना सकता है और उन्नत प्रयोगों के लिए नए रास्ते खोल सकता है।
भारत के जैव-अर्थव्यवस्था पारिस्थितिकी तंत्र में आए व्यापक बदलाव को रेखांकित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 10 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 200 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है, जो एक बड़ी छलांग है। उन्होंने इस तीव्र प्रगति का श्रेय अनुकूल नीतिगत दृष्टिकोण और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को दिया।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि BioE3 पहल का ध्यान अब उद्योग के लिए तैयार विनिर्माण पर अधिक केंद्रित हो रहा है, ताकि अनुसंधान को उत्पादों, प्रौद्योगिकियों और उपयोगी समाधानों में परिवर्तित किया जा सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का अंतिम उद्देश्य उद्योग और अन्य हितधारकों के लिए उपयोगी परिणाम उपलब्ध कराना होना चाहिए, ताकि अनुसंधान में लगाए गए प्रयास सार्थक परिणामों में परिवर्तित हो सकें।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि स्टार्ट-अप्स, लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) तथा शोधकर्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 22 मैन्युफैक्चरिंग हब विकसित किए जा रहे हैं। उन्होंने नेशनल बायो-फाउंड्री नेटवर्क के अंतर्गत विकसित की जा रही आठ विशिष्ट सुविधाओं का भी उल्लेख किया और इसे स्टार्ट-अप्स तथा उद्यमियों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को एक साथ उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि 50 से अधिक प्रक्रिया नवाचारों को स्केल-अप किया जा रहा है, जो अनुसंधान को व्यावहारिक उपयोग तक पहुंचाने पर बढ़ते जोर को दर्शाता है।
केंद्रीय मंत्री ने कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) के क्षेत्र में हो रहे कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग लगभग 38 परियोजनाओं को सहयोग प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि एकीकृत बायो-मैन्युफैक्चरिंग और CCU के माध्यम से कार्बन कैप्चर के साथ-साथ सीमेंट और इस्पात जैसे उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए भी समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने जैव प्रौद्योगिकी के उभरते क्षेत्रों में सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल, I3 PhD कार्यक्रम और स्पेस बायोटेक्नोलॉजी का उल्लेख किया। उन्होंने जीवन-विज्ञान संबंधी प्रयोगों में ISRO के साथ सहयोग का भी उल्लेख किया, जिसमें मायोजेनेसिस, संज्ञानात्मक प्रभावों और सायनोबैक्टीरिया की वृद्धि से संबंधित कार्य शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने जेनेटिक्स के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाए हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कृषि-जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में BRIC-NABI के कार्य, विशेषकर इसे बायोप्रोसेस इंजीनियरिंग के साथ एकीकृत करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का अनुसंधान कृषि अपशिष्ट को न्यूट्रास्यूटिकल्स और उच्च-मूल्य वाले बायोमैटेरियल्स में परिवर्तित करने में मदद कर सकता है। इससे कृषि अवशेषों से अतिरिक्त आर्थिक मूल्य सृजित किया जा सकेगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने संस्थागत सहयोग और क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि एक ही शहर या क्षेत्र में स्थित संस्थानों को आपसी समन्वय और सहयोग की संभावनाओं का पता लगाना चाहिए। ऐसे क्लस्टर न केवल अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं, बल्कि शैक्षणिक सहयोग, छात्रों के बीच संवाद तथा विभिन्न संस्थानों में उपलब्ध प्रतिभाओं की पहचान के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।
विभिन्न स्थानों पर संस्थागत क्लस्टर के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने चंडीगढ़ में भी इसी प्रकार का एक सशक्त संस्थागत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया। इसमें जैव प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि, फार्मास्यूटिकल्स और संबंधित क्षेत्रों में कार्य कर रहे संस्थानों को एक साथ जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कनेक्टिविटी से NABI की पहुंच का विस्तार होगा तथा नए विचारों और अंतर्विषयक सहयोग के लिए नए अवसर पैदा होंगे।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की जैव प्रौद्योगिकी यात्रा अब तेजी से अनुसंधान को उत्पादों, प्रौद्योगिकियों और समाधानों में परिवर्तित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके साथ ही कम-कार्बन और सर्कुलर इकोनॉमी का एक नया मॉडल भी उभर रहा है। उन्होंने इस परिवर्तन को 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य और आत्मनिर्भर भारत के व्यापक उद्देश्यों से जोड़ा।
केंद्रीय मंत्री ने BRIC-NABI की पूरी टीम को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि संस्थान विशेष रूप से कृषि-जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की जैव प्रौद्योगिकी क्रांति के अग्रणी संस्थानों में से एक के रूप में उभरेगा। इस अवसर पर जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ. राजेश गोखले, NABI के निदेशक डॉ. पारेख तथा BIRAC के प्रबंध निदेशक डॉ. धनंजय तिवारी ने भी संबोधित किया।




