युवा आंदोलन ने दिखाई हिन्दुस्तान की असली तस्वीर: संजय मग्गू
अंतत: दिल्ली के जंतर मंतर पर युवाओं का पिछले 36 दिनों से चल रहा प्रदर्शन समाप्त हो गया। धमेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है और उसे स्वीकार भी कर लिया गया है। वहीं युवाओं की दो अन्य मांगें नीट पीड़ितों को एक-एक करोड़ रुपये और युवाओं पर दर्ज केस की वापसी भी मान ली गई है। 36 दिन चले युवाओं के इस आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि यदि युवा अपनी जिद पर अड़ जाएं, तो आसमान में भी सुराख कर सकते हैं। यह वही सरकार है जिसके रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि यह एनडीए की सरकार है। यूपीए सरकार की तरह हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते हैं। हालांकि इससे पहले 2018 में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर का इस्तीफा हुआ था। तब दुनियाभर में 'मी टू' आंदोलन चल रहा था और अकबर पर पत्रकारिता के दिनों में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे। देश के युवाओं की यह बहुत बड़ी सफलता है। आंदोलन के दौरान हिंदुस्तान की सच्ची तस्वीर उभर कर सामने आई। युवाओं ने जाति, धर्म, भाषा, प्रांत जैसी भावनाओं से ऊपर उठकर लड़ाई लड़ी और सफलता पाई। उन्होंने बता दिया कि जब सबके उद्देश्य साझे हों, तो संकीर्णताएं कोई मायने नहीं रखती हैं। जंतर मंतर पर हजारों लड़कियां हजारों लड़कों के बीच दिन रात रहीं, लेकिन किसी के साथ बदसलूकी नहीं हुई। लाठीचार्ज के दौरान पुलिसकर्मियों पर जरूर ऐसे आरोप लगे। हिंदुस्तान की असली झांकी देखकर मन को यह आश्वस्ति जरूर हुई कि कोई भी कितनी जातीय और सांप्रदायिक मतभेद पैदा करने की कोशिश करे, लेकिन भारत के लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। सांप्रदायिक भेदभाव हिंदुस्तान की जनता के डीएनए में ही नहीं है। वह कुछ लोगों के बहकावे में आकर भले ही क्षणिक रूप से विचलित हो सकती है, लेकिन यह उसका स्थायी भाव नहीं है। देश की जनता ने भी इन युवाओं का भरपूर समर्थन किया। बहुत सारे लोग ऐसे थे जो युवाओं का समर्थन करने के लिए जंतर मंतर आना चाहते थे, लेकिन अपनी निजी और व्यावसायिक मजबूरी के चलते नहीं आ पाए। ऐसे लोगों ने दूसरी तरह से मदद करके अपनी उपस्थिति दर्शाई। हजारों छात्रों को पिछले छत्तीस दिनों तक खाने-पीने, रहने की कोई दिक्कत नहीं हुई। देशभर से लोगों ने भरपूर सहायता भेजी। किसी ने दवा भेजा, तो किसी ने पानी। किसी ने आंदोलनकारी युवाओं के लिए पिज्जा बर्गर की व्यवस्था की, तो किसी ने कोल्ड ड्रिंक की। गुरुद्वार से लंगर आए, तो मुसलमानों ने खाने के पैकेट भिजवाए। हिंदुओं ने खाने-पीने की भरपूर व्यवस्था की। जैसे सबमें होड़ लगी हो कि इन युवाओं की ज्यादा से ज्यादा सहायता कौन करता है। असली हिंदुस्तान यही है। सबने कंधे से कंधा मिलाकर अपनी लड़ाई लड़ी। लड़की या लड़के का भेद भुलाकर, जाति धर्म की दीवारों को जमींदोज करके लड़ने वाले युवाओं को आज अपने उद्देश्य में सफलता मिल गई। अब विजयी युवा घर जाकर जी जान से पढ़ाई करें और अपना अभीप्सित लक्ष्य हासिल करें, यही कामना है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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