पीजीआईएमईआर ने मनाया सीलिएक रोग जागरूकता दिवस, शीघ्र पहचान और आजीवन खानपान अनुशासन पर दिया जोर
“सीलिएक रोग केवल एक चिकित्सा स्थिति नहीं, बल्कि जीवनशैली में बदलाव है; जागरूकता और खानपान अनुशासन के साथ बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं” – प्रो. साधना लाल
सीलिएक रोग जागरूकता दिवस के अवसर पर पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी विभाग द्वारा बच्चों, अभिभावकों एवं देखभालकर्ताओं को सीलिएक रोग की शीघ्र पहचान,
चंडीगढ़: सीलिएक रोग जागरूकता दिवस के अवसर पर पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी विभाग द्वारा बच्चों, अभिभावकों एवं देखभालकर्ताओं को सीलिएक रोग की शीघ्र पहचान, दीर्घकालिक प्रबंधन तथा इससे जुड़ी जटिलताओं की रोकथाम के प्रति जागरूक करने हेतु एक विशेष रोगी शिक्षा एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
पीजीआईएमईआर की निरंतर रोगी शिक्षा पहलों के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य परिवारों को इस दीर्घकालिक ऑटोइम्यून रोग के बारे में व्यावहारिक जानकारी प्रदान करना था, जो मुख्यतः गेहूं एवं उससे संबंधित अनाजों में पाए जाने वाले ग्लूटेन के सेवन से उत्पन्न होता है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. साधना लाल, प्रमुख, बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी विभाग, पीजीआईएमईआर ने कहा, “सीलिएक रोग केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि जीवनभर की जीवनशैली में परिवर्तन है। इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए केवल चिकित्सीय निदान ही नहीं, बल्कि सख्त आहार अनुशासन, जागरूकता और परिवार की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।”
उत्तर भारत में इस रोग के बढ़ते बोझ पर प्रकाश डालते हुए प्रो. लाल ने बताया कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा आसपास के क्षेत्रों में आनुवंशिक प्रवृत्ति एवं गेहूं-प्रधान खानपान के कारण सीलिएक रोग अधिक पाया जाता है। उन्होंने कहा, “पीजीआईएमईआर द्वारा चंडीगढ़ में किए गए स्कूल-आधारित स्क्रीनिंग शोध में पाया गया कि लगभग हर 120 बच्चों में से 1 बच्चा सीलिएक रोग से प्रभावित हो सकता है, जो इसे एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बनाता है।”
प्रो. लाल ने कहा कि इसकी व्यापकता के बावजूद यह रोग अक्सर पहचान में नहीं आ पाता, क्योंकि इसके लक्षण कई बार हल्के या असामान्य होते हैं। उन्होंने कहा, “सीलिएक रोग एक हिमखंड की तरह है—दिखाई देने वाले लक्षण इसके वास्तविक बोझ का केवल एक छोटा हिस्सा हैं। कई मरीज वर्षों तक बिना पहचान के रहते हैं, जबकि अंदरूनी क्षति लगातार होती रहती है।”
रोग की प्रस्तुति के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पहले दस्त और विकास में रुकावट को इसके प्रमुख लक्षण माना जाता था, लेकिन अब रोग के स्वरूप में काफी बदलाव आया है। “आज कई बच्चों की वृद्धि सामान्य होती है, लेकिन उनमें अस्पष्ट एनीमिया, हल्का पेट दर्द या अन्य सूक्ष्म लक्षण हो सकते हैं। इसलिए चिकित्सकों और अभिभावकों को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है,” उन्होंने कहा।
प्रो. लाल ने जोर देकर कहा कि केवल लक्षणों के आधार पर निदान नहीं किया जा सकता और वैज्ञानिक पुष्टि आवश्यक है। उन्होंने कहा, “एंटी-टीटीजी एंटीबॉडी की रक्त जांच तथा आवश्यकता पड़ने पर एंडोस्कोपी और आंतों की बायोप्सी, निदान की पुष्टि के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, विशेषकर क्योंकि इसका उपचार जीवनभर के लिए आहार प्रतिबंध पर आधारित होता है।”
उपचार पर बल देते हुए प्रो. लाल ने दोहराया कि इस रोग का एकमात्र प्रभावी उपचार सख्त आजीवन ग्लूटेन-फ्री आहार है। उन्होंने कहा, “निदान के बाद गेहूं और गेहूं से बने सभी उत्पादों को पूरी तरह बंद करना आवश्यक है। आहार में थोड़ी-सी भी चूक आंतों को नुकसान पहुंचा सकती है और दीर्घकालिक जटिलताओं का कारण बन सकती है।”
अभिभावकों को सलाह दी गई कि वे ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का और दालों जैसे प्राकृतिक रूप से सुरक्षित अनाजों से घर पर तैयार ग्लूटेन-फ्री भोजन को प्राथमिकता दें तथा ऐसे प्रोसेस्ड एवं पैकेज्ड खाद्य पदार्थों से बचें जिनमें संदूषण का जोखिम हो सकता है।
निवारक स्वास्थ्य उपायों पर प्रकाश डालते हुए प्रो. लाल ने स्तनपान की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा, “हमारे शोध से संकेत मिलता है कि जिन बच्चों को कम से कम छह महीने तक केवल स्तनपान कराया गया, उनमें रोग की गंभीरता अपेक्षाकृत कम पाई गई।”
व्यवहार संबंधी पहलुओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे भोजन को बच्चे के जीवन का केंद्र न बनाएं। उन्होंने कहा, “सीलिएक रोग से पीड़ित बच्चे पूरी तरह सामान्य, सक्रिय और संतोषजनक जीवन जी सकते हैं। ध्यान उनके शिक्षा, खेल, रुचियों और व्यक्तित्व विकास पर होना चाहिए, न कि भोजन से जुड़ी चिंताओं पर।”
कार्यक्रम में रोग की समझ, आहार परामर्श, सुरक्षित भोजन पद्धतियां, आटे की घरेलू तैयारी के दौरान क्रॉस-कंटैमिनेशन से बचाव, तथा स्कूल एवं सामाजिक परिस्थितियों में आहार अनुशासन बनाए रखने की व्यावहारिक रणनीतियों पर इंटरैक्टिव सत्र आयोजित किए गए।
इस अवसर पर बच्चों, अभिभावकों, देखभालकर्ताओं एवं स्वास्थ्यकर्मियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जो सीलिएक रोग के प्रति बढ़ती जागरूकता और सहयोगात्मक देखभाल की आवश्यकता को दर्शाता है।
बाल पाचन स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाने के प्रति पीजीआईएमईआर की प्रतिबद्धता दोहराते हुए प्रो. लाल ने कहा, “जागरूकता, शीघ्र निदान और अनुशासित प्रबंधन ही जटिलताओं की रोकथाम तथा सीलिएक रोग से प्रभावित बच्चों के स्वस्थ भविष्य की आधारशिला हैं।”

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