सच्चा कलाकार अपनी किसी रचना से संतुष्ट नहीं होता
संजय मग्गू
पूरे ब्रह्मांड में सबसे बड़ी कलाकार केवल प्रकृति है। कलाकार कोई भी हो, वह अपनी उत्कृष्ट से उत्कृष्ट रचना को लेकर सभी संतुष्ट नहीं होता। वैसे तो अगर हम इंसानी कलाकार की बात करें, तो आप ऐसे किसी कलाकार को नहीं खोज पाएंगे जिसने केवल एक ही रचना की हो और उसके बाद रचना करनी बंद कर दी हो। कलाकार किसी भी किस्म का हो, मूर्ति बनाता हो, चित्र बनाता हो, भवन बनाता हो या और कुछ, वह अपनी रचना से संतुष्ट नहीं हो सकता है। यही उसकी खूबी है। कलाकार की पिछली रचना अगली रचना की शुरुआत का बिंदु है। प्रकृति भी अपनी रचनाओं से संतुष्ट नहीं होती है। शायद यही वजह है कि एक इंसान की सूरत दूसरे से कतई नहीं मिलती है। जानवर भी लगभग एक जैसे नहीं होते हैं। उनमें भी कुछ न कुछ अंतर जरूर होता है। यह क्रम सदियों से चला आ रहा है। इंसान, चीता, शेर, मछली जैसे लाखों करोड़ों जीव जंतु हमारी पृथ्वी पर मौजूद हैं, लेकिन हर जीव अपने ही कोटि के जीवों से अलग दिखाई देता है। हमारी नजर दो शेरों या एक ही प्रजाति के दो जीवों में अंतर न खोज पाएं, लेकिन उनमें कुछ न कुछ अंतर जरूर होता है। यही प्रकृति रूपी कलाकार की खूबी है। एक पहाड़ दूसरे पहाड़ जैसा नहीं है। एक नदी दूसरी नदी जैसा व्यवहार नहीं करती है। यही वजह है कि पृथ्वी अब तक ज्ञात सभी ग्रहों में सबसे ज्यादा सुंदर है, आकर्षक है, मनमोहक है। इसकी विविधता ही इसका सबसे बड़ा सौंदर्य है। यह प्रकृति में विविधता नहीं होती, तो यह पृथ्वी कितनी नीरस होती, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रकृति जानती है कि उसकी हर रचना अधूरी है। यह अधूरापन ही उसे प्रेरित करता है कि वह हर बार नई रचना करे। यही वजह है कि हर जीव जंतु एक दूसरे से भिन्न होते हैं। यदि हम प्रकृति या किसी कलाकार में में परिपूर्णता खोजने का प्रयास करते हैं, तो यह हमारी भूल है। पूर्ण तो यह प्रकृति खुद नहीं है जिसने इतनी सुंदर-सुंदर रचनाएं प्रदान की हैं। यह अपूर्णता ही हमें प्रेरित करती है कि हम कुछ नया करते चलें। एक रचनाकार, चाहे कवि हो, उपन्यासकार हो, लेखक हो, मूर्तिकार हो, शिल्पकार हो, वह हमेशा यही प्रयास करता है कि उसकी रचना दुनिया की सर्वश्रेष्ठ रचना हो, लेकिन रचना होने के बाद उसे खुद ही अपनी रचना में किसी न किसी किस्म की कमी जरूर दिखाई दे जाती है। इस मामले में अफसोस की बात यही है कि हम इंसानों ने प्रकृति की रचनाओं को अब नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। पहाड़ हो, नदी हो, वन हो और दूसरी अन्य रचनाएं, हमने उनके स्वरूप को कुरूप बनाना शुरू कर दिया है। हमारी अनावश्यक हस्तक्षेप के चलते ही प्रकृति की रचनाशीलता न केवल प्रभावित हो रही है, बल्कि पहले से मौजूद रचनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। नतीजा यह हो रहा है कि प्रकृति की रचनाएं अब मानव जाति के लिए ही खतरा बनती जा रही है। कहीं बाढ़ के रूप में, तो कहीं ग्लेशियरों के पिघलने के रूप में, तो कहीं ग्लोबल वार्मिंग के रूप में। यह हमारे ही बुरे कर्मों का नतीजा है कि प्रकृति का स्वरूप बदलता जा रहा है। यदि दुनिया को बचाए रखना है, तो हमें प्रकृति में अनावश्यक हस्तक्षेप बंद करना होगा।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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