चीन-अमेरिका कट्टर प्रतिद्वंद्वी, पर साथ रहने की मजबूरी
संजय मग्गू
यह कॉलम लिखे जाने तक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका की यात्रा पर रवाना हो गए थे। दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच अमेरिका में होने वाली बातचीत का प्रभाव केवल इन दो देशों के बीच ही नहीं रहेगा। दोनों महा शक्तियां वैसे तो एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं। लेकिन दोनों इस बात को अच्छी तरह जानती हैं कि मौजूदा वैश्विक हालात में टकराव दोनों के हित में नहीं है। इसका एक कारण भी है। दोनों महाशक्तियां कुछ मामलों में एक दूसरे पर निर्भर हैं। ऐसी हालत में टकराव दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। सप्लाई चेन, दुर्लभ खनिज और टेक्नोलॉजी के स्तर पर दोनों एक दूसरे के बिना आगे नहीं बढ़ सकते हैं। चीन को जहां अमेरिकी टेक्नोलॉजी चाहिए अपने यहां औद्योगिक आधार मजबूत करने के लिए, वहीं अमेरिका की मजबूरी यह है कि रेयर अर्थ मटैरियल के मामले में वह पूरी तरह चीन पर निर्भर है। यही वजह है कि अभी कुछ दिन पहले सौ प्रतिशत टैरिफ कानून बनने के बावजूद अमेरिका चीन को शायद ही उस कानून के दायरे में लाए। इससे पहले भी ट्रंप चीन पर 145 से 155 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर चुके हैं। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हें चीन को इससे छूट देनी पड़ी थी क्योंकि चीन ने दुर्लभ खनिज की सप्लाई रोक दी थी।
विभिन्न स्रोतों से मीडिया में जो बात निकलकर सामने आई है, उसके मुताबिक कहा जा सकता है कि ट्रम्प-जिनपिंग के बीच की द्वपक्षीय बातचीत में व्यापार, टैरिफ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ताइवान और रूस से जुड़े मुद्दे शामिल हो सकते हैं। ईरान, चीन और रूस के बीच बढ़ती निकटता ट्रंप को रास नहीं आ रही है। वह हर हालत में चाहते हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। वैसे तो चीन भी यही चाहता है, लेकिन ईरान के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते इस मामले में उसके कदम को ठिठका देते हैं। इस बात कोई इनकार नहीं कर सकता है कि एशिया में चीन ने अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है। वैसे भी वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है।
ऐसी स्थिति में भी चीन अवसर मिलने पर उसे भुनाने में कभी चूक नहीं करता है। वह ब्रिक्स और एससीओ यानी शंघाई सहयोग संगठन के जरिये अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इसी महीने दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग की मौजूदगी यही बताती है। इन संगठनों में रूस और ईरान जैसे अमेरिका विरोधी देश शामिल हैं, वहीं भारत भी है जो अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलन बनाए रखता है। सच तो यह है कि जब ट्रंप ने सौ प्रतिशत टैरिफ वाला कानून बनाया है, तब से ट्रंप की विश्वनीयता पर धब्बा लगा है। अमेरिका के ही सहयोगी देश उससे अपना दामन छुड़ाने की फिराक में लग गए हैं।
भारत सहित कई देशों में अब ट्रंप को विश्वसनीय नहीं माना जा रहा है। यही वजह है कि ट्रंप और जिनपिंग जब वार्ता की टेबल पर बैठेंगे, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वह किसी भी प्रकार के टकराव को टालने की कोशिश करेंगे। टकराव वैसे भी अर्थव्यवस्था पर एक बोझ के समान होता है और दोनों देश टकराव कर पाने की स्थिति में कतई नहीं हैं।

About The Author
नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।



