केंद्र सरकार के लिए मुसीबत न बन जाए ई-20 जनता पार्टी : संजय मग्गू
अभी केंद्र सरकार सीजेपी के आंदोलन से उपजे हालात को नियंत्रित भी नहीं कर पाई थी कि ई-20 जनता पार्टी ने पेट्रोल में बीस प्रतिशत एथनाल मिलाने के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यह भी सीजेपी की तरह आनलाइन पैदा हुआ संगठन माना जा रहा है, लेकिन इसे आम आदमी पार्टी का भरपूर समर्थन हासिल है। आम आदमी पार्टी ने एक अगस्त को दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब में नेशनल टाउनहाल अगेंस्ट ई-20 आयोजित किया है। ई-20 जनता पार्टी ने भी सीजेपी की तरह केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के इस्तीफे की मांग की है। ई-20 जनता पार्टी का भविष्य क्या होगा, यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सीजेपी के आंदोलन के बाद भाजपा सरकार दबाव में है।
बिहार में आंदोलनकारी छात्रों पर दर्ज की गई एफआईआर को खत्म करवाने में केंद्र सरकार की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। उधर सुप्रीमकोर्ट ने भी संसद मार्च के दौरान युवाओं पर किए गए बल प्रयोग को उचित नहीं माना है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान ने भी सरकार पर दबाव बना दिया। कहा जा रहा है कि भाजपा में भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक खास वर्ग में नाराजगी है।
सीजेपी के आंदोलन के शुरुआती दिनों में मध्यम वर्ग के अभिभावकों का बहुत ज्यादा जुड़ाव प्रदर्शन से नहीं था, लेकिन जब युवाओं पर बर्बर तरीके से बल प्रयोग किया गया, तो मध्यम वर्ग के माता-पिता भी युवाओं के साथ हो गए। उन्हें यह महसूस होने लगा कि उनके बच्चे बिल्कुल सही राह पर हैं। यह भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका है क्योंकि भाजपा के एक बहुत बड़े जनाधार का हिस्सा यही मध्यमवर्गीय माता-पिता हैं। यह दबाव भी भाजपा को ही झेलना है। वैसे भी 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके जनाधार घटने के साथ-साथ लोकसभा में सीटें भी घटी हैं। 36 दिनों तक जंतर मंतर पर चले आंदोलन का सबसे अधिक फायदा कांग्रेस को मिलने की संभावना जताई जा रही है।
सीजेपी के आंदोलन से पहले ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी और एनएसयूआई पेपर लीक और युवाओं के मुद्दे को लेकर सक्रिय थे। इसी दौरान सीजेपी का प्रदर्शन शुरू हो गया, तो राहुल गांधी और कांग्रेस ने इससे किनारा कर लिया। भाजपा को युवाओं के आंदोलन को राजनीतिक दल का मुखौटा कहने का भी अवसर नहीं मिला। जब युवाओं पर लाठी चार्ज किया गया, तो राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, अखिलेश सिंह यादव ने पीएम हाउस के पास धरना-प्रदर्शन करके युवाओं के साथ होने का एहसास दिलाया। कांग्रेस ने सबसे सेफ चाल चली और उसने सीजेपी की जीत को अपना बताने का प्रयास नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि युवाओं के आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहीं नेहा बोरा जैसे कई लोगों को कांग्रेस के मंच पर आने को मजबूर होना पड़ा। कांग्रेस अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूती के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ा सकती है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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