नूंह के स्कूलों की बदहाली पर मानवाधिकार आयोग सख्त-सरकार से मांगी रिपोर्ट
निजी भवन और खुले मैदान में चल रही पढ़ाई पर लिया स्वत: संज्ञान।
देश के आकांक्षी और पिछड़े जिलों में शामिल हरियाणा के नूंह जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स सामने आने के बाद हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने जिले के कई सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति पर स्वत: संज्ञान लेते हुए गंभीर चिंता जताई है।
फिरोजपुर झिरका। देश के आकांक्षी और पिछड़े जिलों में शामिल हरियाणा के नूंह जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स सामने आने के बाद हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने जिले के कई सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति पर स्वत: संज्ञान लेते हुए गंभीर चिंता जताई है। आयोग ने कहा कि बच्चों को सुरक्षित, सम्मानजनक और बुनियादी सुविधाओं से युक्त शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन नूंह के कई गांवों में हालात बेहद चिंताजनक हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि फिरोजपुर झिरका खंड के गांव कुबड़ाकाबास में सरकारी प्राथमिक विद्यालय एक निजी भवन में संचालित किया जा रहा है। यह भवन गांव के ही एक व्यक्ति का है, जिसने बच्चों को शिक्षा से वंचित न रहने देने के उद्देश्य से दिन के समय स्कूल चलाने के लिए अपना मकान उपलब्ध कराया हुआ है। हालांकि यह भी सच है कि रात के समय उसी भवन में पशु बांधे जाते हैं, जिसको लेकर आयोग ने चिंता जाहिर की है। आयोग का मानना है कि ऐसी परिस्थितियां बच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मानजनक शिक्षा के अधिकार के अनुकूल नहीं हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार कुबड़ाकाबास गांव से रावली गांव की दूरी करीब तीन किलोमीटर है। छोटे बच्चों के लिए रोजाना इतनी दूरी तय कर स्कूल पहुंचना आसान नहीं है। इसी वजह से गांव में ही अस्थायी रूप से स्कूल संचालित किया जा रहा है, ताकि बच्चे शिक्षा से वंचित न रहें। वहीं कालू बास गांव में बच्चे खुले मैदान और पेड़ों के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं। गर्मी, बारिश और सर्दी के मौसम में बच्चों और शिक्षकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
जानकारी के मुताबिक फिरोजपुर झिरका ब्लॉक में करीब 10 ऐसे स्कूल हैं जिनके पास स्वयं की बिल्डिंग नहीं है। शिक्षा विभाग कई बार संबंधित अधिकारियों को लिखित रूप से अपनी मजबूरियों और भवनों की कमी के बारे में अवगत करा चुका है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि कई गांवों में भूमि उपलब्ध न होने के कारण स्कूल भवन निर्माण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
कुबड़ाकाबास गांव का मामला भी इसी समस्या से जुड़ा हुआ है। बताया जा रहा है कि कुबड़ाकाबास में पंचायत के पास अपना कोई रकबा उपलब्ध नहीं है और अधिकांश जमीन वन विभाग के अधीन आती है। ऐसे में स्कूल निर्माण के लिए जमीन उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बना हुआ है। हालांकि रावली पंचायत ने इस समस्या के समाधान के लिए वन विभाग को प्रस्ताव भेजा है। प्रस्ताव में कहा गया है कि यदि वन विभाग स्कूल निर्माण के लिए जमीन उपलब्ध कराता है तो पंचायत बदले में अपने रकबे से वन विभाग को जमीन देने को तैयार है।
आयोग ने यह भी माना कि वर्ष 2020 में नूंह जिले में कई नए स्कूल स्वीकृत किए गए थे, लेकिन आज भी अनेक विद्यालय भवन और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। दूरदराज क्षेत्रों से लगाए गए संविदा शिक्षक लंबी दूरी और संसाधनों की कमी के कारण नौकरी छोड़ रहे हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
मामले में हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव, स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव, नूंह के उपायुक्त और जिला शिक्षा अधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है। आयोग ने स्कूलों की वास्तविक स्थिति, भवन निर्माण, सुरक्षित वातावरण, शिक्षकों की उपलब्धता और सुधारात्मक कदमों की जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को निर्धारित की गई है।

About The Author
संबंधित समाचार



