यह जेन जेड है जनाब, प्यार से समझाइए, मान जाएंगे: संजय मग्गू
सैनेटरी नैपकिन से मेरे पीरियड्स इतने लीक नहीं होते, जितने सरकारी संस्थाओं में पेपर लीक होते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर खड़ी एक जेन जेड जब यह कह रही थी, तो उसके चेहरे पर न कोई झिझक थी और न ही किसी किस्म का तनाव। उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि उसके मां-बाप, भाई-बहन, मोहल्ले-टोले वाले जब यह वीडियो देखेंगे तो क्या सोचेंगे। सच कहें तो इस जेन जेड का यह कथन उस भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा है जो पिछले सत्तर पचहत्तर साल से पारदर्शी परीक्षा कराने का दावा करता आ रहा है।

पेपर लीक की शुरुआत कोई आज नहीं हुई है और न आज के बाद बंद हो जाएगी। लेकिन शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ मुट्ठियां तानकर शायद पहली बार जेन जेड खड़ा हुआ है। इससे पहले संपूर्ण क्रांति का नारा बुलंद कर जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा शासन के खिलाफ युवाओं को खड़ा किया था। उस आंदोलन से निकले छात्र नेताओं ने बाद में जिस तरह भारतीय राजनीति की ऐसी-तैसी कर दी, वह सबके सामने है। लेकिन यह जेन जेड है। यह पुस्तकालय नहीं जाती है। किताबें भी नहीं पढ़ती है। इसकी लाइब्रेरी और पुस्तकें मोबाइल में ही है। यह 1997 के बाद जन्मे हैं। इनकी उम्र बीस से सत्ताइस के बीच है। इनकी भाषा में शर्म या लिहाज जैसी चीजें नहीं हैं। बदतमीज पर उतर आएं, तो यह अपने मां-बाप को भी भरे बाजार बेइज्जत कर दें। इन्हें राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। यह किसी को भी खुलेआम गाली देने की कूबत रखते हैं। इन्हें पुलिस, जेल, ईडी, सीआईडी का भी भय नहीं है। इनके जेब में टका नहीं है, लेकिन इनमें साहस इतना है कि यह पहाड़ से भी टकरा जाएं।
बस, इनकी समझ में आना चाहिए कि पहाड़ से टकराना उचित है, जायज है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर मौजूद युवाओं को जरा गौर से देखिए। वह आज उस शासन सत्ता से टकराने निकले हैं जिसे भारी भरकम मतों से उन्होंने ही सत्ता सौंपी थी। झोली भर-भरकर वोट देकर। इनका पाखंड से दूर-दूर तक नाता नहीं है। इनके चेहरे पर किसी किस्म का खौफ भी नहीं है। पुलिस की लाठियों से चोट खाकर गिरे जेन जेड के चेहरे पर कहीं भी कातरता, भय या बेचैनी नहीं नजर आई होगी। यह साहस इनमें ही हो सकता है कि यह पुलिस से जाकर पूछें कि आंसू गैसे गोले लाए हैं क्या? मानता हूं, जेन जेड बदतमीज हैं, बदमिजाज हैं।
केंद्र सरकार और पीएम के संदर्भ में ऐसी-ऐसी बातें कह रहे हैं जो इन्हें कतई नहीं कहना चाहिए। इन्हें इस बात का एहसास तक नहीं है कि इन्हें क्या कहना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन इनमें अपने भविष्य को लेकर जो बेचैनी है, जो चिंता है, जो घबराहट है, वह नाजायज नहीं है। भविष्य की अनिश्चितता ने इनमें जो साहस पैदा किया है, उस साहस को आप नकार नहीं सकते हैं।
इनका लक्ष्य बिल्कुल साफ है, साफ सुथरी शिक्षा व्यवस्था। ऐसी हालत में अगर बल प्रयोग करके इन्हें रास्ते पर लाने की बात सोची गई, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। अहंकार, सत्ता का मद और शक्तिशाली होने का गुमान त्यागकर बड़े प्रेम से इनसे बात करनी होगी। भरोसा दिलाना होगा कि भविष्य में शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन होगा। जेन जेड मान जाएंगे

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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