हिमालय की चेतावनी को समझिए, नहीं तो तबाही निश्चित: संजय मग्गू

संजय मग्गू
पहाड़ का अपना स्वभाव होता है। यदि उसके मामले में ज्यादा हस्तक्षेप किया जाए, तो वह उग्र रूप धारण कर लेता है। बुधवार को नेपाल की ओर बेहद ऊंचाई पर ल्हेंडे खोला नदी के उद्गम स्थल पर स्थित तिब्बत का सर्क ग्लेशियर का एक बहुत विशाल हिस्सा टूटकर चार हजार फीट नीचे घाटी में आ गिरा। इससे भोटकोशी नदी की सहायक ल्हेंडे खोला नदी का प्रवाह रुक गया। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह दुनिया के सामने है। बुधवार को ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में नेपाल में 547 और तिब्बत में पांच लोगों की मौत हो चुकी है। दोनों देशों में 1,000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। आज भी भोटकोशी नदी के ऊपरी हिस्से में बनी झील फट गई है। इस झील में शुक्रवार को 25 लाख क्यूबिक पानी जमा हो गया था।

वैज्ञानिक इस तरह की घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम से जोड़कर देख रहे हैं। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का कारण आइस रॉक एवलांच और ग्लेशियर का टूटना माना जा रहा है। पिछले तीन-चार दशक से हिमालय संकेतों से बार-बार अपना प्रतिरोध जता चुका है। उत्तराखंड के केदारनाथ में जून 2013 में हुई भयंकर तबाही हिमालय का एक सशक्त प्रतिरोध था। इस भयंकर तबाही के बावजूद भारत, तिब्बत और नेपाल आदि के भाग्य विधाताओं ने हिमालय के विरोध को समझने की जरूरत नहीं समझी। पिछले कुछ दशक से देशी और विदेशी वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् यह कहते चले आ रहे हैं कि दुनिया भर की पर्वत शृंखलाओं में हिमालय की प्रकृति कुछ भिन्न है। वह अन्य पर्वतों जैसा नहीं है। पर्यावरणविदों ने कई बार चेतावनी दी है कि हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ते हस्तक्षेप को सहन करने की स्थिति में हिमालय नहीं रह गया है। लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियों को हिमालय क्षेत्र बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। इन चेतावनियों के बावजूद हम नहीं संभले, हमारा हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है और उसी का नतीजा है कि 26 अगस्त को नेपाल को ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने से जन-धन की हानि सहनी पड़ी। हर साल बरसात के दिनों में देश के हिमालयी क्षेत्र में बार-बार बादल फटने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत तीन संस्थानों ने रिसर्च करके बताया है कि हिमालय की 221 झीलें ऐसी हैं जो किसी भी समय नेपाल से भी अधिक तबाही भारत में ला सकती हैं। सच कहा जाए, तो जब से इंसानों ने पर्वतीय क्षेत्र में धार्मिक स्थलों को तीर्थाटन की जगह पर्यटन में बदलने का प्रयास करना शुरू कर दिया है, तभी से पर्वतीय क्षेत्रों में आपदाएं बढ़ी हैं। हिमालय की पहाड़ियों को काटकर चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाना, पेड़ों को काट करके पहाड़ों को नंगा कर देना, डायनामाइट लगाकर पहाड़ियों में विस्फोट करना, घातक साबित होता जा रहा है। इससे पर्वत भी गर्म हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से पहाड़ों पर बने ग्लेशियर पिघल रहे हैं। बुधवार को नेपाल में मची तबाही के पीछे भी ग्लोबल वार्मिंग ही है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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