एआई तस्वीरें नहीं, आठवें दशक के संस्कार लौटा दो

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संजय मग्गू

हमारे देश में भेड़चाल कोई नई बात नहीं है। इन दिनों आठवें दशक की तस्वीरों को फेसबुक, इंस्टाग्राम या अन्य सोशल मीडिया मंचों पर पोस्ट करने की लोगों में होड़ लगी हुई है। लोग वास्तविक या एआई जनरेटेड फोटो डालकर उस भेड़चाल में शामिल हो रहे हैं जिसे किसी व्यक्ति ने नहीं शुरू किया है, बल्कि यह सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं द्वारा मिलकर शुरू किया गया एक सामूहिक विंटेज और नॉस्टैल्जिया (पुराने दिनों की याद) ट्रेंड है।

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लोग बिना कुछ सोचे समझे धड़ाधड़ अपनी तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि जिन तस्वीरों को वह एआई से बनाने के लिए चैटजीपीटी या जेमिनी पर अपलोड कर रहे हैं, वह थर्ड पार्टी के सर्वर तक पहुंच रही है। भविष्य में इन तस्वीरों का दुरुपयोग या डीपफेक का खतरा भी हो सकता है। इसके साथ-साथ एक तस्वीर को एआई पिक में बदलने पर बिजली और पानी की खपत बढ़ जाती है। सर्वर को ठंडा रखने के लिए पानी की जररूत होती है। ऐसी स्थिति में करोड़ों तस्वीरों को बनाने में कितनी बिजली खपत हुई होगी। इससे पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। अगर, इस ट्रेंड से किसी को लाभ हो रहा है, तो वह हैं डेटा कंपनियां और फेशियल डेटा चुराने वाले। और फिर अस्सी के दशक की तस्वीरें बनाने से हमारे जीवन में क्या बदलाव आ जाएगा? अगर बदलाव लाना है, तो अस्सी के दशक की सभ्यता, संस्कृति और सुकून वापस लाओ।

अस्सी के दशक में भले ही आज जैसा तकनीकी विकास न हुआ हो, लेकिन जितना भी तकनीकी विकास था, वह इंसान को सहूलियत प्रदान करता था। इंसान सुकून की जिंदगी बसर करता था। जीवन में इतनी आपाधापी भी नहीं थी। लोग एक दूसरे से जुड़े हुए थे। शहर का कोई मोहल्ला हो या गांव, लोग एक दूसरे से परिचित थे। फलां लड़का किसका बेटा है, उसकी कैसी हैसियत है, उसके घर में क्या तकलीफ है, यह मोहल्ले का हर बड़ा-बुजुर्ग जानता था और उनकी परेशानी दूर करने का प्रयास करता था। गांव का हर लड़का-लड़की किसी न किसी रिश्ते से बंधे हुए थे। गांव की बेटी सबकी बेटी समझी जाती थी। अगर किसी के यहां बारात आती थी, मोहल्ले के लड़के जुट जाते थे बारातियों की सेवा सत्कार करने में जैसे उनकी ही बहन-बेटी की शादी हो। अगर वापस लाना ही है, तो आठवें दशक जैसे संस्कार वापस लाओ। रिश्तों की मर्यादा को वापस ला दो। एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने की मनोवृत्ति वापस कर दो। बदलाव की इतनी ही चाहता है तो एकल परिवार यानी मिनी परिवार को फिर से संयुक्त परिवार में बदल दो। वह संयुक्त परिवार दोबारा बना दो जिसमें चाचा, ताऊ, दादा, दादी, चाची और सारे चचेरे भाई-बहन एक दूसरे सुख-दुख में शामिल होते थे। एक साथ खेलते-खाते थे, लड़ते झगड़ते थे, लेकिन मन में किसी के गांठ नहीं रहती थी। लेकिन अफसोस, गुजरा समय लौट कर नहीं आता है। अतीत अतीत ही रहेगा, भले ही कोई कितनी कोशिश कर ले। अतीत को याद रखना अच्छी बात है। इससे पुराने समय की गई गलतियों से सीखने को मिलता है, लेकिन अतीत को जीवंत नहीं किया जा सकता है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्‍स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।

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