सूर्य कवि दादा लख्मी चंद की सोच को साकार कर रही सुपवा
-- 15 जुलाई, जन्मदिन पर विशेष -- डॉ अमित आर्य, कुलगुरु, डीएलसीसुपवा

हरियाणवी के प्रसिद्ध सांग सम्राट, कवि व लोक कलाकार दादा लख्मी चंद को उनकी 123वीं जयंती पर सर्वप्रथम प्रणाम, विनम्र श्रद्धांजलि। दादा लख्मी चंद का जन्म सोनीपत जिले के जाट्टी कलां गांव में एक साधारण किसान गौड़ ब्राह्मण परिवार में 15 जुलाई 1903 को हुआ। दो भाई व तीन बहनों में वे अपने पिता की दूसरी संतान थे। बाल्यावस्था में उन्हें पशु चराने के लिए खेतों में भेजा जाने लगा। लेकिन, उनकी गाने में रुचि थी। वह हमेशा कुछ न कुछ गुनगुनाते रहते। सात-आठ वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपनी मधुर व सुरीली आवाज से लोगों का मन मोहना शुरू कर दिया। ग्रामीण उनसे नित गीत व भजन सुनाने का आग्रह करने लगे। ग्रामीणों की अपार प्रशंसा से उत्साहित बालक लख्मी चन्द ने अनेक गीत व भजन कंठस्थ कर लिए और गायकी के मार्ग पर अपने कदम तेजी से बढ़ा दिए। गांव जांटी कलां में एक विवाह समारोह में बसौदी निवासी पंडित मान सिंह भजन-रागनी का कार्यक्रम करने के लिए पहुंचे। वे आंखों से देख नहीं सकते थे। उन्होंने कई दिन तक गांव में भजन व रागनियां सुनाईं। बालक लख्मी चन्द भी उनके भजन सुनने के लिए प्रतिदिन जाते थे। लख्मी चन्द के हृदय पटल पर पंडित मान सिंह का ऐसा जादू हुआ कि उन्होंने सीधे मान सिंह जी को अपना गुरु बनाने का निवेदन कर डाला। एक बालक के गायकी के प्रति इस अपार लगाव से प्रभावित होकर पंडित मान सिंह ने उनके पिता पंडित उदमी राम से इस बारे में बात की और उनकी सहमति के बाद उन्होंने बालक लख्मी चन्द को अपना शिष्य बनाना स्वीकार कर लिया। इसके बाद वे अपने गुरु से ज्ञान लेने में तल्लीन हो गए और असीम लगन व कठिन परिश्रम से वे निखरते चले गए।
कुछ ही समय में लोग उनकी गायन प्रतिभा और सुरीली आवाज के कायल हो गए। अब उनकी रूचि ‘सांग’ सीखने की हो गई। ‘सांग’ की कला सीखने के लिए लख्मी चन्द कुण्डल निवासी सोहन लाल के बेड़े में शामिल हो गए। अडिग लगन व मेहनत के बल पर पांच साल में ही उन्होंने ‘सांग’ की बारीकियां सीख लीं। उनके अभिनय एवं नाच का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा। उनके अंग-अंग का मटकना, मनोहारी अदाएं, हाथों की मुद्राएं, कमर की लचक और गजब की फुर्ती का जादू हर किसी को मदहोश कर देता था। जब वे नारी पात्र अभिनीत करते थे तो देखने वाले बस देखते रह जाते थे। इसी बीच सोहन लाल ने लख्मी चन्द के गुरु मान सिंह के बारे में कुछ असभ्य बात मंच से कह दी, जिसका उन्हें अत्यन्त बुरा लगा। उन्होंने सोहन लाल का बेड़ा छोड़ने का ऐलान कर दिया। इससे भन्नाए कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने धोखे से लख्मी चन्द के खाने में पारा मिला दिया, जिससे उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। उनकी आवाज को भी भारी क्षति पहुंची, लेकिन सतत साधना के जरिए उन्होंने कुछ समय बाद पुनः अपनी आवाज में सुधार किया। इसके बाद उन्होंने स्वयं अपना अलग बेड़ा तैयार करने का मन बना लिया।
लख्मी चन्द ने अपने गुरुभाई जैलाल नदीपुर माजरावाले के साथ मिलकर मात्र 18-19 वर्ष की उम्र में ही अलग बेड़ा बनाया और ‘सांग’ मंचित करने लगे। अपनी बहुमुखी प्रतिभा और महान आशा के बल पर उन्होंने एक वर्ष के अन्दर ही लोगों के बीच पुनः अपनी पकड़ बना ली। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए बड़े-बड़े नामी कलाकार उनके बेड़े में शामिल होने लगे और पंडित लख्मी चन्द देखते ही देखते ‘सांग-सम्राट’ के रूप में विख्यात होते चले गए। ‘सांग’ के दौरान साज-आवाज-अन्दाज आदि किसी भी मामले में किसी तरह की ढील अथवा लापरवाही उन्हें बिल्कुल भी पसन्द नहीं थी। उन्होंने अपने बेड़े में एक से बढ़कर एक कलाकार रखे और ‘सांग’ कला को नई ऐतिहासिक बुलन्दियों पर पहुंचाया।
प्रारम्भ में लख्मी चंद श्रृंगार रस की रचनाओं पर जोर देते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान को भी अपनी रचनाओं में पिरोना शुरू कर दिया। वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों और अन्य धार्मिक ग्रन्थों का ज्ञान लेने के लिए उन्होंने दो विद्वान शास्त्रियों को अपने साथ जोड़ लिया। वे आध्यात्मिक ज्ञान में ऐसे डूबे की संत प्रवृत्ति के होते चले गए और जीवन के आखिरी दशक में वैरागी-सा जीवन जीने लगे। दान एवं पुण्य कार्यों में उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान दिया।
लंबी बीमारी के उपरान्त 17 जुलाई, 1945 की सुबह उनका देहान्त हो गया। वे अपनी अथाह एवं अनमोल विरासत छोड़कर गए हैं। उनकी इस विरासत को सहेजने व आगे बढ़ाने के लिए उनके सुपुत्र पंडित तुलेराम ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इसके बाद तीसरी पीढ़ी में उनके पौत्र पंडित विष्णु दत्त कौशिक भी अपने दादा की विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में अति प्रशंसनीय भूमिका अदा कर रहे हैं। अब चौथी पीढ़ी के तौर पर चेतन कौशिक इसी विधा को आगे ले जाने की शुरुआत कर चुके हैं। चेतन अपने पड़दादा के नाम पर बनी दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसीसुपवा) से अभिनय के क्षेत्र में ग्रेजुएशन भी कर चुके हैं। हरियाणवी रागनी व सांग में उल्लेखनीय योगदान के कारण दादा लख्मी चंद को ‘सूर्य-कवि’ कहा जाता है। उनके नाम पर साहित्य के क्षेत्र में कई पुरस्कार दिए जाते हैं।
दादा लख्मी के नाम को हमेशा-हमेशा के लिए अमर रखने के लिए ही प्रदेश सरकार ने रोहतक में बनी स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स का नामकरण दादा लख्मी चंद के नाम पर किया। यह यूनिवर्सिटी पूरी तरह से कला को समर्पित है। जहां युवाओं को न सिर्फ फिल्म जगत में एंट्री के लिए एक्टिंग समेत अन्य सभी कोर्स कराए जा रहे हैं, बल्कि विजुअल आर्ट्स, डिजाइन व प्लानिंग एवं आर्किटेक्चर में भी पारंगत किया जा रहा है। डीएलसीसुपवा के छात्रों की कोर्स फिल्में, डॉक्यूमेंट्री, म्यूजिक वीडियो आज देश-विदेश के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चयनित हो रहे हैं। आने वाले समय में यहां के छात्र दादा लख्मी की मेहनत व लग्न व अनुसरण करते हुए अपना, परिवार, प्रदेश व देश का नाम जरूर रोशन करेंगे।
-- लेखक, डॉ अमित आर्य। दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स के कुलगुरु हैं।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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