बुजुर्गों से संस्कृति, इतिहास सीख सकते हैं युवा: संजय मग्गू

संजय मग्गू
एक पुरानी कहावत है कि बनिये को मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है। यह कहावत दादा-दादी और पौत्र-पौत्रियों पर भी लागू होती है। बुजुर्गों में अकसर यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। यह मानव स्वभाव है। इसमें उत्तर-दक्षिण या पूरब-पश्चिम का भेद नहीं होता है। यह प्रवृत्ति हरियाणा में पाई जाती है, तो केरल के शहरों और गांवों में भी मिलेगी। इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली और अगली पीढ़ी से वैचारिक और व्यावहारिक साम्यता नहीं रख पाती है। माता-पिता और पुत्र-पुत्री में संकोच, मत वैभिन्य, आदर जैसे तमाम भाव सहज व्यवहार में बाधा बनते हैं। जनरेशन गैप के कारण व्यवहार में सहजता नहीं आ पाती है। संयुक्त परिवार में यह संबंध आसानी से परिलक्षित होता था, लेकिन एकल परिवार ने जहां माता-पिता और पुत्र-पुत्री के बीच प्रेमभाव और निकटता में दरार डाली है, तो पहली और तीसरी पीढ़ी के बीच भी संबंध बनने से रोक दिया है। नतीजा यह हो रहा है कि अब शहरों में वृद्धाश्रम की बढ़ती संख्या संबंधों में आई दरार को पूरी तरह प्रकट करती है। सच कहें, तो वृद्धाश्रम किसी भी बुजुर्ग के लिए अपने जीवन की सांध्य बेला में आश्रय स्थल ही नहीं, उनकी विवशता का प्रतीक है।
जब बुजुर्ग को अपने परिवार को सहारे की जरूरत होती है, इंद्रियां शिथिल होती है, ऐसी स्थिति में किसी बुजुर्ग को अपने परिवार से दूर रहने की पीड़ा झेलनी पड़े, तो वह कैसा महसूस करेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। हर वृद्धाश्रम बुजुर्गों की विवशता का लहराता परचम है। ऐसी स्थिति में यदि देश के युवा चाहें तो इन बुजुर्गों की पीड़ा को कम कर सकते हैं। उन्हें इस बात को याद रखना होगा कि आज वह युवा हैं, ताकत है, जोश है, संकल्प है, ईमानदार प्रयास भी है। आज के बुजुर्ग भी किसी समय युवा थे। इन्होंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा आएगा जब उनके ही परिजन उनसे पीछा छुड़ाकर उन्हें वृद्धाश्रम की राह दिखा देंगे। जो व्यवहार आज बुजुर्गों के साथ हो रहा है, कल आज के युवाओं के साथ नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है। यदि हो सके, तो युवाओं को अपने घर और वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों के साथ कुछ समय बिताएं। वह इन बुजुर्गों से उनके जीवन भर में संचित अनुभवों को ग्रहण कर सकते हैं।

बुजुर्ग अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में भी युवाओं के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं। अपने समय की संस्कृति, इतिहास, सभ्यता और उनके जीवन में आए बदलाव के कारणों पर जो प्रकाश डाल सकते हैं, वह किसी लाइब्रेरी की पुस्तकों में नहीं मिलेगा। बुजुर्गों के पास जो कुछ मिलेगा, वह खुद का भोगा हुआ यथार्थ, आंखों देखा हुआ बदलाव और गढ़ा गया इतिहास होगा। यदि युवाओं को इन सबकी जरूरत नहीं है, तो भी उन्हें बुजुर्गों के साथ कुछ समय जरूर व्यतीत करना चाहिए ताकि उन्हें अपने जीवन के अंतिम काल में यह महसूस हो सके कि कोई तो है जो उनके लिए चिंतित है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।



