आकेड़ा झील बना आफत: 5000 एकड़ जमीन जलमग्न, तीन साल से किसान बेहाल, मुआवजे की मांग तेज
नूंह जिले के आकेड़ा झील के आसपास जलभराव की समस्या अब किसानों के लिए गंभीर संकट बन चुकी है।
नूंह (मेवात):
नूंह जिले के आकेड़ा झील के आसपास जलभराव की समस्या अब किसानों के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। पिछले करीब तीन वर्षों से लगातार बनी इस समस्या ने क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को पूरी तरह चरमरा दिया है। किसानों के अनुसार करीब 5000 एकड़ से अधिक उपजाऊ कृषि भूमि पानी में डूबी हुई है, जिससे न केवल फसल उत्पादन ठप हो गया है, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब हो गई है। हालात ऐसे हैं कि अपनी ही जमीन होने के बावजूद किसान खेती करने में असमर्थ हैं और उन्हें बाजार से अनाज खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि आकेड़ा झील के आसपास बसे 5 से 6 गांव इस समस्या से बुरी तरह प्रभावित हैं। खेतों में लगातार पानी भरे रहने से जमीन बंजर होती जा रही है और खेती योग्य नहीं बची है। गेहूं, सरसों और अन्य रबी-खरीफ फसलों की बुवाई तक संभव नहीं हो पा रही है। इससे किसानों की आय का प्रमुख स्रोत खत्म हो चुका है और वे कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं।

आकेड़ा निवासी किसान खुर्शीद ने बताया कि पिछले तीन सालों से हालात जस के तस बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन आज तक न तो जल निकासी की व्यवस्था की गई और न ही किसी प्रकार का मुआवजा मिला। “हमारी जमीन पानी में डूबी है, फसल उगाना नामुमकिन हो गया है। मजबूरी में हमें बाहर से अनाज खरीदना पड़ रहा है,” उन्होंने दर्द बयां करते हुए कहा।
किसानों का कहना है कि बरसात के मौसम में समस्या और भी विकराल रूप ले लेती है। पानी का स्तर बढ़ने से नुकसान कई गुना बढ़ जाता है और खेत पूरी तरह तालाब में तब्दील हो जाते हैं। जल निकासी की कोई स्थायी व्यवस्था न होने के कारण हर साल यही स्थिति दोहराई जाती है।
समस्या को और गंभीर बनाता है अरावली क्षेत्र की नजदीकी, जहां से जंगली जानवर खेतों की ओर रुख कर रहे हैं। किसानों के अनुसार फसल बची-खुची हो तो उसे भी जानवर नुकसान पहुंचा देते हैं, जिससे उनकी परेशानियां और बढ़ जाती हैं।
किसानों ने आरोप लगाया कि राज्यपाल सहित कई बड़े अधिकारी और जनप्रतिनिधि क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं और किसानों की समस्याएं भी सुनी गई हैं। कई बार जल निकासी के लिए आश्वासन भी दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इससे किसानों में भारी रोष व्याप्त है।
अब प्रभावित किसानों ने सरकार से स्पष्ट मांग की है कि या तो जलभराव की स्थायी निकासी की व्यवस्था की जाए या फिर पिछले तीन वर्षों में हुए नुकसान का उचित मुआवजा दिया जाए। किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही समाधान नहीं निकला तो वे बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
आकेड़ा झील के आसपास की यह समस्या अब केवल किसानों का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और ग्रामीण संकट का प्रतीक बनती जा रही है। ऐसे में जरूरत है कि सरकार और प्रशासन तुरंत संज्ञान लेते हुए स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए, ताकि किसानों को राहत मिल सके और क्षेत्र की कृषि व्यवस्था फिर से पटरी पर लौट सके।




