भारतीय खेती पर पड़ा ईरान-अमेरिका युद्ध का असर, यूरिया की कीमतों में 84 प्रतिशत तक उछाल।
खरीफ सीजन से पहले यूरिया का स्टॉक हुआ कम, अन्य विकल्प तलाशने में जुटी सरकार।
जबसे ईरान-अमेरिका युद्ध शुरू हुआ तभी से होर्मुज स्ट्रेट पर परिवहन ठप्प पड़ा है। इससे कच्चा तेल और एलपीजी गैस तो प्रभावित हुई है। साथ ही रासायनिक उर्वकों के आयात पर भी इसका असर पड़ा है। सप्लाई चेन बाधित होने से इसकी कीमतों में भारी उछाल आया है। ये सीजन तो जैसे-तैसे संभल सकता है, लेकिन रबी सीजन में खाद की कमी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। इसलिए सरकार और कंपनियां वैकल्पिक समाधान तलाशने में जुटी हैं।

अप्रैल का महीना चल रहा है ऐसे में एक तरफ तपती धूप सितम ढा रही है। दो महीने बाद मानसून भी अपनी दस्तक देने लगेगा। खरीफ फसलों की बुवाई शुरू हो जाएगी। उसके लिए किसानो को बोरी भर-भर के यूरिया खाद की आवश्यकता होगी। देश में पर्याप्त यूरिया का उत्पादन ना होने से सरकार को इसे दोगुने से ज़्यादा रेटों पर आयत करना पड़ रहा है। जिस वजह से इसकी कीमतों में भारी उछाल आया है। ऐसा इसलिए ताकि किसानों को खरीफ फसल की बुवाई में यूरिया की कमी नहीं पड़े।
भारत में यूरिया की सबसे ज्यादा खपत
रासायनिक खादों की जब बात आती है तो भारत में इसकी सबसे ज़्यादा खपत होती है। कृषि विशेषजों का कहना है कि हर साल देश में करीब 400 लाख टन यूरिया की खपत होती है। जिसमे से करीब 310 लाख टन यूरिया का उत्पादन देश में होता है। बाकी बचा 90 से 10 लाख टन यूरिया, इसकी पूर्ति के लिए इसे विदेशों से आयात करना पड़ता है।

स्टॉक में आई कमी
खरीफ सीजन से पहले देश में यूरिया का स्टॉक कम हो गया है। 1 अप्रैल 2026 को यूरिया का भंडार 54.22 लाख टन था, जो पिछले साल से कम है। यह पिछले चार साल में सबसे कम स्तर माना जा रहा है। अगर समय पर खाद नहीं मिली, तो फसलों पर असर पड़ सकता है
कहाँ से होता है आयात
भारत अपना अधिकतर यूरिया परंपरागत रूप से मध्य पूर्व के देशों, ओमान, सउदी अरब, संयुक्त अरब अमिरात जैसे देशों से आयात करता है। वहां से आने वाले यूरिया का मार्ग होर्मुज स्ट्रेट ही है, जो कि पिछले दो महीने से बाधित है। इसी संकट के कारण भारत की यूरिया आपूर्ति में भारी बाधा आई है।
दोगुनी कीमत पर आयात
भारत को पहले के मुकाबले लगभग दूनी कीमत पर यूरिया खरीदना पड़ रहा है। खबर है कि भारतीय पोटाश लिमिटेड ने 15 लाख टन यूरिया, जिसकी डिलीवरी पश्चिमी तट पर होगी, का सौदा 935 डॉलर प्रति टन की दर पर किया है। वहीं देश के पूर्वी तट पर 10 लाख टन यूरिया की डिलीवरी होनी है। इसका सौदा 959 डॉलर प्रति टन की दर पर किया गया है। उल्लेखनीय है कि ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने से पहले भारत विदेशों से 490 डॉलर प्रति टन की दर पर यूरिया खरीदा करता था। इस समय जो सौदा हुआ है, वह पहले के मुकाबले करीब 90 फीसदी अधिक है।
दुनिया भर में बढ़ी खाद की कीमतें
आपको बता दें कि अभी जो सौदा हुआ है, उससे पहले दो दर्जन से अधिक कंपनियों ने ऑफ़र पेश किया था। इनमें $935 से $1,136 प्रति टन के बीच का रेट रखा गया था। इसलिए सबसे कम कीमत वाला सौदा जो कि $935 है इस पर सरकार ने खरीद की सहमति जताई है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के बाद भारत की पहली खेद होगी।

दूनी कीमत पर खरीद क्यों जरूरी?
भारत में जैसे मानसून सीजन की शुरुआत होती है तभी से खरीफ फसलों की बुवाई शुरू हो जाती है। इस समय में धान, मक्का, सोयाबीन जैसी महत्वपूर्ण फसलों की बुवाई होती है जो कि भारत के खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तब किसान को पर्याप्त मात्रा में यूरिया की आवश्यकता होगी। इसलिए सरकार ने दूनी कीमत पर भी यूरिया की सप्लाई के आर्डर दिए गए हैं। अभी कई मिलियन टन यूरिया की खरीद का टेंडर और जारी होना है।
भारतीय कारखानों में उत्पादन हुआ बाधित
एक तो खपत के हिसाब से पहले ही देश में रासायनिक उर्वरक कम बनते है दूसरा। इस समय खाद बनाए वाले जो कारखाने हैं उनमे भी यूरिया का उत्पादन पूरी गति से नहीं हो रहा है। जिसका सबसे बड़ा कारन है नेचुरल गैस आयत कम होना। दअसल दक्षिण एशियाई देशों में यूरिया उत्पादन बहुत हद तक नेचुरल गैस पर निर्भर करता है। नेचुरल गैस का अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है। यूरिया बनाने के लिए अमोनिया बनाना पड़ता है। इसे बनाने में गैस का उपयोग होता है। हार्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने के बाद से कई उत्पादकों को अपने कारखाने बंद करने पड़े। वही कुछ कारखानों में काम बहुत कम हो रहा है।

कहां से आएगा यूरिया?
सरकार ने कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे यूरिया ऐसे देशों से खरीदें जहां से सुरक्षित तरीके से आपूर्ति हो सके। इसलिए अब ये यूरिया रूस, मिस्र, नाइजीरिया, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से आ सकता है। सरकार का प्रयास कि ये खाद समय पर पहुँच जाये ताकि किसानो को परेशनी का सामना ना करना पड़े। इससे यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद देश में पहुंच सके।

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