गुरु शिष्य परंपरा प्रशिक्षण योजना के तहत आवेदन आमंत्रित : डीआईपीआरओ बिजेंद्र कुमार
-गुरू, संगीतकार व शिष्यों को प्रतिमाह मिलेगी 7500, 3750 व 1500 छात्रवृति
उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज की ओर से महानिदेशक कलां एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग हरियाणा के माध्यम से गुरु शिष्य परंपरा प्रशिक्षण योजना के तहत लुप्त होती विभिन्न विद्याओं जैसे शास्त्रीय एवं लोक संगीत, लोक थियेटर एवं दृश्य कला इत्यादि विधा के गुरू, संगीतकार व शिष्यों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं।
पलवल: उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज की ओर से महानिदेशक कलां एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग हरियाणा के माध्यम से गुरु शिष्य परंपरा प्रशिक्षण योजना के तहत लुप्त होती विभिन्न विद्याओं जैसे शास्त्रीय एवं लोक संगीत, लोक थियेटर एवं दृश्य कला इत्यादि विधा के गुरू, संगीतकार व शिष्यों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं।
जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी बिजेंद्र कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज को शास्त्रीय एवं लोक संगीत, लोक थियेटर एवं दृश्य कला इत्यादि विधा में निपुण एवं पारंगत प्रशिक्षकों की प्रशिक्षण देने के लिए आवश्यकता है। आवेदन करने के लिए आयु 50 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए तथा संबंधित क्षेत्र में 20 वर्ष का अनुभव होना चाहिए। उन्होंने बताया कि गुरु, संगीतकार व शिष्यों को क्रमश: 7500 रुपए, 3750 रुपए व 1500 रुपए प्रतिमाह की दर से छात्रवृति भी प्रदान जाएगी।

डीआईपीआरओ ने बताया कि उक्त विद्याओं में पारंगत प्रशिक्षक अपना आवेदन नाम, पता एवं दूरभाष नंबर सहित अन्य विवरण महानिदेशक कलां एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा, एससीओ नंबर-29, सेक्टर 7-सी, मध्य मार्ग, चंडीगढ़ के पते पर भिजवा सकते हैं ताकि उन्हें उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज को भिजवाया जा सके।
योजना की पात्रता व मापदंड :
1. आवेदक की आयु 50 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।
2. आवेदक के पास अपने कला क्षेत्र का कम से कम 20 वर्ष का अनुभव होना चाहिए।
3. आवेदक अपने बायो-डाटा व नवीनतम छायाचित्र के साथ प्रार्थना पत्र भेजेे।
4. अपने कला क्षेत्र में मिले प्रमाण पत्रों की स्वयं द्वारा प्रमाणित प्रतियां संलग्न करें।
5. सरकार या प्रमुख कला और संस्कृति से जुड़ी संस्था से मिले पुरस्कार या मान्यता प्राप्त प्रमाण पत्रों की प्रतियां संलग्न करें।
6. विधा के प्रशिक्षण हेतु एक गुरु, चार शिष्य (लोक गायन, लोकगाथा, लोक चित्रकला, दुर्लभ वाद्ययंत्रों, लोक नृत्यों), लोकनृत्यों में अधिकतम आठ एवं जिन विधाओं में संगतकारों की आवष्यकता होगी उसमें एक या दो संगतकारों को रखना निर्धारित किया गया है।

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