काश कि बेटी की फीस के लिए किसी रमाबाई को न दौड़ना पड़े

संजय मग्गू
कोई भी स्त्री अगर सबसे ज्यादा किसी को प्यार करती है, तो वह है उसकी संतान। मां अपनी संतान के लिए कुछ भी कर सकती है। किसी भी तरह का कष्ट उठा सकती है। जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों के लिए किसी से भी भिड़ सकती है। दुनिया में मां और संतान का ही एक ऐसा रिश्ता है जो निस्वार्थ होता है। इसमें किसी प्रकार की लालसा या लोभ नहीं होता है। वैसे तो दुनिया भर की मांओ ने समय-समय पर अपनी संतान के लिए ऐसे काम किए हैं जो इतिहास बन गए।

26 अगस्त को महाराष्ट्र के बीड जिले की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने अपनी बेटी की फीस जुटाने के लिए मैराथन में भाग लिया और दौड़ जीतकर तीन हजार रुपये हासिल कर लिया। बीड जिले में 29 अगस्त 2026 को खोलेश्वर एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स के अमृत जयंती वर्ष के मौके पर 'अमृत दौड़' (मैराथन) का आयोजन किया गया था। इस दौड़ में रमाबाई ने हिस्सा लिया और साड़ी पहनकर दौड़ीं। इस दौड़ में भाग लेने वाले लोगों के पास हर तरह की सुविधाएं थीं, लेकिन साड़ी में दौड़ने वाली रमाबाई के सामने बस एक ही लक्ष्य था कि उन्हें अपनी छोटी बेटी की फीस के लिए यह दौड़ जीतनी है। दौड़ते समय जब चप्पल फिसलने लगी, तो चप्पल को हाथ में लेकर दौड़ीं और मैराथन जीत लिया। रमाबाई का मैराथन जीतना उतनी बड़ी घटना नहीं है जितनी कि उस दौड़ में हिस्सा लेने का कारण है। एक तरह से यह उस व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है, जो यह कहते हुए नहीं थकती है कि उनके राज्य में बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है।
यह सवाल भी उठना लाजिमी है कि जरूरतमंद छात्रों के लिए घोषित छात्रवृत्तियां, फीस माफी, मुफ्त किताबें और छात्रावास जैसी सुविधाएं अगर राज्य सरकार दे रही है तो वह हासिल किसे हो रही है? तमाम सुविधाएं हासिल करने वालों की सूची में रमाबाई रणवीर की बेटी शामिल क्यों नहीं है? यह सही है कि महाराष्ट्र सरकार ने रमाबाई की आर्थिक मदद करने का आश्वासन दिया है, लेकिन ऐसी नौबत ही क्यों आई कि एक 47 वर्षीय मां को अपनी बेटी की फीस और कापी-किताबों के लिए दौड़ना पड़ा। ऐसी स्थिति तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। संतोष की बात यह है कि रमाबाई को शिक्षा का महत्व ज्ञात है। वह इतनी परेशानी के बावजूद अपनी दोनों बेटियों को उचित शिक्षा देने को संघर्षरत हैं। पति की मौत के बाद भी जिस तरह वह अपनी बेटियों का भविष्य सुधारने की कोशिश में लगी हुई हैं, वह निस्संदेह प्रणम्य है। लेकिन उनकी दौड़ की घटना को यों ही कुछ दिनों बाद भुला देना, उचित नहीं है।
एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील व्यवस्था के लिए उचित यही है कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि भविष्य में किसी भी मां को अपनी संतान को पढ़ाने के लिए इस तरह का साहस न करना पड़े। शिक्षा के प्रति समर्पित एक मां की यह साहसिक मिसाल तो हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए लज्जाजनक भी है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।



