जलवायु परिवर्तन की चेतावनी सुनो, अभी समय है चेत जाओ

संजय मग्गू
यह प्रकृति की द्वंद्वात्मकता ही है कि पृथ्वी के एक हिस्से में इन दिनों आग बरस रही है, जंगल जल रहे हैं और वहीं दूसरी ओर भारी बारिश के चलते जल प्रलय हो रही है। यूरोप में आल्पस पर्वत जल रहा है। यूरोप के वनों में आग लग रही है। ऐसा लगता है कि अग्नि ने यूरोप के जंगलों में अपना डेरा जमा लिया है। यूरोप में अगस्त के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत तक यूरोप में पिछले साल की तुलना में इस बार ढाई गुना ज्यादा जंगल स्वाहा हो गए। यूरोप तपती हुई गर्म भट्टी की तरह हो गया है। लोग गर्मी के मारे बदहाल हैं। यूरोप के देशों में अगस्त महीने की शुरुआत में ही गर्मी के चलते काफी संख्या में लोगों के मरने की खबरें आई थीं। तब लोगों से यह अपील की गई थी कि वह दोपहर के समय घर से बाहर निकलने से परहेज करें। वहीं, हिमालय क्षेत्र में जल प्रलय की स्थिति है। अगस्त के आखिरी दिनों में तिब्बत में ग्लेशियर के पिघलने से नेपाल में आया सैलाब प्रकृति की इसी द्वंद्वात्मकता को साबित कर रहा है। एक तरफ तो यूरोप जलती भट्टी की तरह गर्म हो रहा है, वहीं एशिया में स्थित हिमालयी क्षेत्र में बरसात और टूटते ग्लेशियरों ने भारी तबाही मचा रखी है। यूरोप और एशिया की यह दोनों स्थितियां एक दूसरे से अलग नहीं हैं। इन दोनों स्थितियों का आपस में बहुत गहरा संबंध है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका, एशिया या यूरोप में जंगलों में आग नहीं लगती रही है। गर्मी के दिनों में हिमालयी क्षेत्रों में वनों में आग लगने की घटनाएं सदियों से होती रही हैं। लेकिन तब और अब के हालात में काफी अंतर है। हिमालयी क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप से पहले आग लगने की घटनाएं होती रही हैं, लेकिन तब प्रकृति आग को बुझाने की व्यवस्था स्वयं कर लेती थी। लेकिन जब से हर क्षेत्र में मानव हस्तक्षेप बढ़ा है, प्रकृति ने रौद्र रूप धारण करना शुरू कर दिया है। चार-पांच दशक पहले तक जलवायु विनियम में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका महासागर निभाते रहे हैं।
जलवायु विनियमन प्रकृति की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी का पारिस्थितिक तंत्र तापमान, मौसम और वायुमंडल में गैसों के संतुलन को बनाए रखता है। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 91 प्रतिशत हिस्सा तो समुद्र ही सोख लेते थे। लेकिन जब से कार्बन उत्सर्जन असीमित हो गया, तब से समुद्र भी गर्म होने लगे और उनके अवशोषण की क्षमता भी कम हो गई। नतीजा यह हुआ कि समुद्र में भी जलीय जीवों का जीवनचक्र गड़बड़ा गया। कई जलीय जीव-जंतु तो विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए और बहुत सारे विलुप्त हो गए। इसी का नतीजा है कि कहीं बहुत अधिक बरसात हो रही है, तो कहीं सूखा पड़ा हुआ है। कहीं हाड को कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है, तो कहीं इतनी गर्म पड़ रही है कि लोगों का जीवन दुश्वार हो गया है। जलवायु परिवर्तन का यह प्रारंभिक चरण है। जैसे जैसे हालात बदलते जाएंगे, इंसानी जीवन खतरे में पड़ता जाएगा। जलवायु परिवर्तन हर जगह चेतावनी दे रहा है। यदि अभी नहीं संभले, तो दोबारा मौका नहीं मिलने वाला है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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