अपने ही बुने जाल-जंजाल में उलझता जा रहा है इंसान: संजय मग्गू

संजय मग्गू
मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसके मन के भीतर छिपी बैठी अशांति है। इंसान कभी संतुष्ट नहीं होता है। उसके पास जितना है, उससे अधिक की लालसा में वह सदैव लगा रहता है। एक कमरे का मकान है, तो वह हर समय इसी जुगत में रहता है कि किसी तरह दो कमरे का मकान हो जाए। ज्यादा से ज्यादा धन, अधिक से अधिक शक्ति, सत्ता, ज्ञान के साथ ही साथ अधिकतम सुरक्षा उसके डीएनए में है। नृविज्ञानी यह बात साबित कर चुके हैं कि इंसान का विकास वानर से हुआ है। नर से वानर बनने की प्रक्रिया में बहुत सारे बदलाव आए। विभिन्न काल और परिस्थितियों में रहते-रहते उसके डीएनए में भी बदलाव आया। लेकिन एक चीज नहीं बदली, स्वयं के प्रति असंतोष। यदि संतोष ही होता, तो वह वानर से नर बनने की प्रक्रिया में पड़ता ही क्यों? इस प्रक्रिया के चलते उसने सीमाओं का अतिक्रमण किया। सीमाओं के अतिक्रमण के पीछे इंसान की अनंत इच्छाएं हैं। यह इच्छाएं ही हैं, जो उसे बार-बार उकसाती हैं सीमाओं का अतिक्रमण करने को। वह हर समय किसी और की तरह बनने की होड़ में लगा रहता है। इसकी वजह से उसके मन में ईर्ष्या का जन्म होता है। ईर्ष्या उसे चैन से बैठने नहीं देती है। वहीं पर्वत हमेशा चैन से रहते हैं। वह किसी दूसरे की तरह नहीं होना चाहते हैं।
पर्वत का सबसे बड़ा गुण है धैर्य। वह करोड़ों साल से अचल, अविरल और गंभीर बने खड़े हैं। उनमें यह कतई लालसा नहीं है कि वह समुद्र जैसा बनें, मैदान जैसा बनें। वह पर्वत हैं, तो पर्वत ही बने रहना चाहते हैं। समुद्र की महानता उसकी गहराई में निहित है। उसकी गहराई को उठने वाली लहरें, ज्वार-भाटा भले ही थोड़ी देर के लिए चंचल कर देती हों, लेकिन वह अपनी गहराई को नहीं छोड़ता है। वह अपनी गहराई को कतई नहीं त्यागता है। उसके आगोश में जीव-जंतु आते हैं, ईंट-पत्थर आते हैं, इंसान द्वारा नदियों में फेंका गया कचरा आता है, इससे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह सबका समान रूप से स्वागत करता है। यही उसकी खूबी है। पर्वत और समुद्र अपने-अपने स्वभाव नहीं छोड़ते हैं। वह अपनी तुलना भी किसी से नहीं करते हैं। जैसे हैं, वैसे ही बने रहने में उनको खुशी मिलती है। लेकिन अपनी तुलना किसी दूसरे व्यक्ति से किए बिना जी ही नहीं सकता है।
इंसान अपने से ज्यादा किसी धनी को देखता है, तो वह दुनिया का सबसे धनी होना चाहता है। सबसे ज्यादा शक्तिशाली और प्रभावशाली होना चाहता है। यही चाहत इंसान को संघर्ष में ढकेलने के लिए पर्याप्त है। जब इंसान वानर से नर बना, तो उसके सामने दो तरह के संघर्ष खड़े हो गए। एक प्रकृति से उसका संघर्ष और दूसरा उसके द्वारा बनाए गए वर्गीय मानव समाज में दूसरे मानव से संघर्ष। इस दोहरे संघर्ष का नतीजा यह हुआ कि उसने जहां प्रकृति को बदल दिया, वहीं उसने वर्गीय मानव समाज में भी विभाजन के बीज बो दिए। अब इंसान अपने ही पैदा किए गए जाल-जंजाल में उलझता चला जा रहा है। इस जाल-जंजाल से मुक्ति का कोई मार्ग उसे सूझ नहीं नहीं रहा है।

About The Author
नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
संबंधित समाचार



