भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा आरक्षण मुद्दा

संजय मग्गू
आरक्षण का मामला आजादी के बाद से ही चुनावी वैतरणी पार उतरने का एक बहुत बेहतरीन जरिया रहा है। आरक्षण के मुद्दे को ढाल बनाकर चुनाव जीते जाते रहे हैं। आज भी हालात बदले नहीं हैं, लेकिन इन दिनों जो हालात हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा आरक्षण के मुद्दे पर फंसती हुई दिखाई दे रही है। दिल्ली से लेकर शहर और ग्रामीण इलाकों में आरक्षण हटाओ आंदोलन की चर्चा हो रही है। उस पर जब 27 अगस्त को भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा आरक्षण हटाओ आंदोलन के प्रतिनिधियों से जब मिलने पहुंचे, तो उन लोगों में जो आरक्षण को बरकरार रखना चाहते हैं, उनमें यह आशंका जरूर पैदा हुई कि कहीं भाजपा आरक्षण हटाने की तैयारी में तो नहीं है। भाजपा इन दिनों दो नावों पर सवार दिखाई देती है। वह खुलकर आरक्षण का समर्थन कर सकती है, न आरक्षण का विरोध। दोनों में से किसी एक के पक्ष में जाने पर उसका चुनावी समीकरण गड़बड़ा जाने की आशंका है। अगले साल सात राज्यों गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं। भाजपा न अपने दलित वोटबैंक को नाराज कर सकती है, न सवर्ण वोट बैंक को। यही वजह है कि भाजपा के ज्यादातर नेता इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। वह कुछ भी बोलने से कतराते हैं। वैसे भी भाजपा पिछले दस वर्षों में बड़ी मुश्किल से अपने ऊपर लगे सवर्ण पाटी का टैग हटाने में सफल हुई है। गैर-जाटव दलित, गैर-यादव ओबीसी और अति पिछड़ा वर्ग नया वोट बैंक है जिसने उसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में निर्णायक बढ़त दिलाई है। इन समुदायों की मांग आरक्षण को कम करने की नहीं, बल्कि उसे और अधिक न्यायपूर्ण और बारीक करने की है।
सुप्रीम कोर्ट ने जब एससी-एसटी के भीतर सब-क्लासिफिकेशन और क्रीमी लेयर की बात की, तो भाजपा के लिए यह एक मौका भी था और एक खतरा भी। अगर वह इसका समर्थन करती है तो अति वंचित समुदायों में भरोसा बढ़ेगा, लेकिन जाटव और पासी जैसी प्रभावशाली दलित जातियों को लगेगा कि उनका हक छीना जा रहा है। इतना ही नहीं, यूजीसी के नए नियमों का मामला भाजपा के गले की फांस बन गया है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में एससी-एसटी और ओबीसी के लिए शिकायत प्रकोष्ठ, भेदभाव रोकने के सख्त नियम और प्रवेश व नियुक्तियों में आरक्षण के कड़ाई से पालन के निर्देशों ने सामान्य वर्ग के शिक्षकों और छात्रों में भारी रोष पैदा कर दिया है। वे इसे शिक्षा में सरकारी दखल और योग्यता के खिलाफ बता रहे हैं और सीधे भाजपा सरकार को घेर रहे हैं। वहीं दलित-पिछड़े संगठनों का आरोप है कि सरकार इन नियमों को कागज पर तो ला रही है, पर जमीन पर लागू कराने की इच्छाशक्ति नहीं दिखा रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन खुद असमंजस में है कि किसे खुश करे।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।
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