Nuh/Mewat News: क्या मुख्यमंत्री से सवाल पूछना और मुस्लिम पत्रकार होना गुनाह है? आफताब अहमद
शाहीन खान, नफीसा खान से कथित मारपीट पर भड़का रोष, विधायक चौधरी आफताब अहमद,और वरिष्ठ पत्रकार यूनुस अल्वी ने की कड़ी निंदा
पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं। वे बिना किसी भेदभाव के जनता की आवाज को शासन और प्रशासन तक पहुंचाने तथा समाज के सामने सच्चाई रखने का काम करते हैं। ऐसे में पत्रकारों के साथ उनकी पहचान या समुदाय के आधार पर कथित दुर्व्यवहार और मारपीट का आरोप सामने आना बेहद गंभीर और चिंताजनक है।
नूंह: पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं। वे बिना किसी भेदभाव के जनता की आवाज को शासन और प्रशासन तक पहुंचाने तथा समाज के सामने सच्चाई रखने का काम करते हैं। ऐसे में पत्रकारों के साथ उनकी पहचान या समुदाय के आधार पर कथित दुर्व्यवहार और मारपीट का आरोप सामने आना बेहद गंभीर और चिंताजनक है। दिल्ली में समाचार कवरेज के दौरान '4PM' की पत्रकार शाहीन खान और फ्रीलांस पत्रकार नफीसा खान के साथ कथित तौर पर हिरासत में लेने, मारपीट और दुर्व्यवहार किए जाने का मामला सामने आया है।

घटना को लेकर पत्रकारों और सामाजिक संगठनों में रोष है। आरोप है कि दोनों महिला पत्रकारों के मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने के कारण उनके साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया गया। घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या मुस्लिम पत्रकार होना गुनाह है?
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं नूंह विधायक चौधरी आफताब अहमद ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि पत्रकार लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं। उन्हें बिना किसी भय, दबाव और भेदभाव के अपना कार्य करने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकार का काम जनता के सवालों को सत्ता के सामने रखना है। यदि किसी महिला पत्रकार के साथ सवाल पूछने और अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभाने के दौरान कथित तौर पर मारपीट की जाती है तो यह बेहद गंभीर विषय है।
आफताब अहमद ने कहा कि किसी पत्रकार के साथ उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर कथित भेदभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हिदायत कमांडो ने कहा कि पत्रकार समाज के हर वर्ग की आवाज उठाते हैं। वे किसी व्यक्ति की जाति, धर्म या समुदाय देखकर उसकी समस्या को सामने नहीं रखते। ऐसे में पत्रकारों के साथ किसी भी प्रकार की हिंसा या अभद्रता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट का मामला गंभीर है।
यदि किसी पत्रकार को उसकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया है तो इसकी निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए। हिदायत कमांडो ने मांग की कि मामले में दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की आवाज दबाने या उन्हें डराने की किसी भी कोशिश का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा।
न्याय नहीं मिला तो बड़ा आंदोलन , यूनुस अल्वी: वरिष्ठ पत्रकार यूनुस अल्वी ने घटना को लोकतंत्र की आत्मा पर आघात बताते हुए कहा कि पत्रकारों के साथ इस तरह का कथित अमानवीय व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि पत्रकार जनता और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि उन्हें ही सवाल पूछने पर डराया या प्रताड़ित किया जाएगा तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज कौन उठाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि पीड़ित महिला पत्रकारों को जल्द न्याय नहीं मिला तो देशभर के पत्रकार और सामाजिक संगठन बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
पहलू सरपंच कंवरसिका ने भी घटना पर गहरा रोष जताया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के साथ इस प्रकार का कथित दुर्व्यवहार किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि पीड़ित महिला पत्रकारों को न्याय मिल सके और यदि कोई दोषी है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
सिर्फ दो पत्रकारों का मामला नहीं, लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल: दिल्ली की इस घटना ने पत्रकारों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक पहचान के आधार पर कथित भेदभाव जैसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्रकारों का काम सवाल पूछना और जनता की आवाज को सामने लाना है। ऐसे में पत्रकारों को भयमुक्त माहौल उपलब्ध कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

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