डिजिटल युग ने जितना दिया, उससे कहीं ज्यादा छीन लिया

संजय मग्गू
हमारे समाज में बातचीत की परंपरा लगभग खत्म होती जा रही है। लोगों को अकसर यह भ्रम होता है कि वह परिवार के साथ हैं। लेकिन सच तो यह है कि वह परिवार के संपर्क में हैं, परिवार के साथ नहीं। आफिस हो या घर, सब जगह आमने-सामने बात करने के अवसर कम होते जा रहे हैं। अगर आफिस में ही किसी सहकर्मी से कुछ पूछा या निर्देश देना हो, तो हम ह्वाट्सएप या ई मेल पर कुछ शब्द टाइप करके भेज देते हैं। वह भी काम चलाऊ लिमिटेड वर्ड्स। एकदम मशीनी अंदाज में। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम उसे मैसेज फारवर्ड करने की जगह फोन पर या आमने-सामने बात कर लें। बातचीत करते समय शब्दों की लय-गति, उच्चारण, चेहरे की भाव भंगिमा यह बता देती है कि सामने वाला क्या कहना चाहता है? बातचीत में जो आत्मीयता झलकती है, वह उन नीरस शब्दों में कहां होती है। बेजान शब्द भावों को व्यक्त नहीं करते हैं, केवल अर्थ बताते हैं।
यह सच है कि आज हम डिजिटल युग में जी रहे हैं। संवाद के नए-नए तरीके ईजाद हो गए हैं। लेकिन मैसेज को फारवर्ड करने की प्रवृत्ति ने मानवीय संवेदना को बहुत नुकसान पहुंचाया है। पति आफिस से निकलते समय अपनी पत्नी को मैसेज करता है, लेट आऊंगा। इन दो शब्दों को लिखने की जगह यदि वह अपनी पत्नी को फोन करके बात कर लेता, तो शायद इन दो शब्दों से कहीं ज्यादा बातचीत होती। दोनों एक दूसरे से बातचीत करके एक आत्मीयता महसूस करते। डिजिटल युग में प्रवेश करने से पहले रिश्ते काफी मजबूत हुआ करते थे। लोग खूब बतियाते थे, गप्पे मारते थे। यार-दोस्तों के साथ बैठकर शाम को धौल-धप्पा भी कर लिया करते थे। एक बाइंडिंग बन जाती थी, जुड़ाव मजबूत हो जाता था। अगर पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन या यार-दोस्त दूर हैं, तो उस जमाने में चिट्ठियां लिखी जाती थीं। उन चिट्ठियों में एक खुशबू आती थी। प्यार की, समर्पण की, आत्मीय होने की। अब तो चिट्ठियों का जमाना गुजर गया। डाक विभाग ने भी पोस्टकार्ड, अंतरदेशीय और लिफाफे की बिक्री बहुत कम या बिल्कुल बंद कर दी है। लोग चिट्ठी पाने के बाद उसे सहेजकर रखते थे। कई बार तो चिट्ठियां लिखी जाते समय लिखने वाले की मनोदशा तक बयान कर देती थीं। पोस्टकार्ड या अंतरदेशीय पर गिरे आंसू के धब्बे अपनी कहानी कह जाते थे। लिखावट सुख-दुख की कहानी को बयां कर देती थी। लेकिन अब वह सब कुछ जैसे डिजिटल युग में बिला गया है। मैसेज तो फारवर्ड किए जा सकते हैं लेकिन भावनाओं को कैसे फारवर्ड किया जाए, यह डिजिटल युग में अभी संभव नहीं हो पाया है। अब तो प्रेम, गुस्सा, नफरत, सुख-दुख को व्यक्त करने के लिए ईमोजी आ गए हैं। दुखी हैं, तो दुखी वाला ईमोजी फारवर्ड कर दीजिए। आपके कर्तव्य की इतिश्री हो गई। खुश हैं, तो हंसता हुआ एक चेहरा भेज दीजिए। मानो अगला इस हंसते हुए चेहरे को देखकर खुश हो जाएगा। डिजिटल युग ने हमें जितना दिया है, उससे कहीं ज्यादा हमसे छीन लिया है। डिजिटल युग ने हमारी भावनाओं को नपुंसक बनाकर रख दिया है।

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नीलोफर हाशमी, देश रोजाना ऑनलाइन में सीनियर पत्रकार हैं। वे करंट अफेयर्स, ह्यूमन नेचर, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाती हैं। मीडिया में नीलोफर को सालों का अनुभव है।



